त्सुगलगखांग महाविहार (दलाई लामा मंदिर)
14वें दलाई लामा का आधिकारिक आवास व मंदिर, जहां बुद्ध शाक्यमुनि, अवलोकितेश्वर और पद्मसंभव की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएं हैं।
बर्फ से ढकी धौलाधार पर्वतमाला की श्वेत दीवारों के नीचे 1,457 मीटर की ऊंचाई पर बसा धर्मशाला और उसके ठीक ऊपर 2,082 मीटर पर स्थित मैक्लोडगंज भारत की सबसे अनूठी आध्यात्मिक व प्राकृतिक शरणस्थली है। 1959 में तिब्बत से निष्कासन के बाद 14वें परम पावन दलाई लामा और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय बनने के कारण इसे 'छोटा ल्हासा' (Little Lhasa) कहा जाता है। त्सुगलगखांग बौद्ध महाविहार, प्रेयर व्हील्स की गूंज, भागसूनाग का पवित्र कुंड व प्रपात, और धौलाधार के विशाल ग्लेशियरों को छूता त्रियुंड ट्रेक धर्मशाला को विश्व के मानचित्र पर प्रतिष्ठित करते हैं।
14वें दलाई लामा का आधिकारिक आवास व मंदिर, जहां बुद्ध शाक्यमुनि, अवलोकितेश्वर और पद्मसंभव की विशाल स्वर्ण प्रतिमाएं हैं।
मैक्लोडगंज से शुरू होने वाला 9 किमी का विश्वप्रसिद्ध डे-ट्रेक, जिसके शिखर से धौलाधार की विशाल बर्फानी दीवारें हाथ की दूरी पर प्रतीत होती हैं।
1,457 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व का सबसे खूबसूरत क्रिकेट स्टेडियम, जिसकी पृष्ठभूमि में धौलाधार की हिमाच्छादित चोटियां चमकती हैं।
नाग देवता और भगवान शिव का पौराणिक मंदिर, जिसके ऊपर चट्टानों से गिरता दूधिया जलप्रपात और प्रसिद्ध शिवा कैफे स्थित है।
1848 में अंग्रेजों द्वारा पंजाब के सिख साम्राज्य से कांगड़ा जीतने के बाद धर्मशाला को एक शांत ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित किया गया था। इसका नाम 'धर्मशाला' एक पुराने हिंदू तीर्थयात्री विश्राम गृह से प्रेरित था। 1959 में जब तिब्बत पर चीनी आधिपत्य के बाद 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने भारत में शरण ली, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मैक्लोडगंज में बसने का आमंत्रण दिया। इसके बाद से यह समूचे विश्व में बौद्ध धर्म, तिब्बती चिकित्सा (मेनकhang), हस्तशिल्प और अहिंसा के दर्शन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
मैक्लोडगंज के मुख्य बाजार के छोर पर स्थित त्सुगलगखांग परिसर में कदम रखते ही 'ओम मणि पद्मे हुम' के मन्त्रों और घूमते हुए प्रेयर व्हील्स की खड़खड़ाहट अंतर्मन को शांत कर देती है। यहां तिब्बती भिक्षु आपस में हाथ मारकर दार्शनिक शास्त्रार्थ (Monastic Debating) करते हैं जो देखने लायक होता है। निचले धर्मशाला के पास स्थित 'नोरबुलिंग्का संस्थान' तिब्बती पारंपरिक थांगका चित्रकला, काष्ठ नक्काशी और धातु शिल्प के संरक्षण हेतु समर्पित एक जादुई जापानी-तिब्बती शैली का हरा-भरा परिसर है।
त्रियुंड ट्रेक भारत के सबसे लोकप्रिय और सुरक्षित ट्रेक्स में गिना जाता है। गालू देवी मंदिर से शुरू होकर रोडोडेंड्रोन (बुरांश) और ओक के जंगलों से गुजरती 22 घुमावदार मोड़ों ('22 कर्व्स') की चढ़ाई 3-4 घंटे में पूरी होती है। शीर्ष पर पहुंचते ही एक ओर कांगड़ा घाटी का विहंगम दृश्य और दूसरी ओर धौलाधार की मुन पीक और इंद्रहार दर्रे की प्रचंड बर्फीली चट्टानें देखकर थकान पल भर में गायब हो जाती है।
मैक्लोडगंज की गलियों में गरमा-गरम थुकपा (नूडल सूप), भाप में पके तिब्बती मोमोज, तिंगमो (सॉफ्ट स्टीम्ड ब्रेड), और लाफिंग (तीखा कोल्ड रोल) हर कोने पर मिलते हैं। यहां तुषिता मेडिटेशन सेंटर और विपश्यना केंद्र में विश्व भर से लोग ध्यान सीखने आते हैं। साथ ही धर्मशाला के निचले भाग में फैले 'कांगड़ा टी एस्टेट्स' की सुगंधित ऑर्गेनिक ग्रीन और ब्लैक टी की चुस्की इस यात्रा को संपूर्ण बनाती है।
दलाई लामा जी के सार्वजनिक प्रवचन (Public Teachings) समय-समय पर त्सुगलगखांग में होते हैं जिनका शेड्यूल dalailama.com पर देखा जा सकता है। व्यक्तिगत भेंट के लिए उनके कार्यालय से विशेष अग्रिम अनुमति लेनी होती है।
धर्मशाला बस स्टैंड से मैक्लोडगंज की दूरी 9 किमी है जो टैक्सी/बस से 25 मिनट में तय होती है। इसके अतिरिक्त आधुनिक धर्मशाला-मैक्लोडगंज स्काईवे (रोपवे) मात्र 5 मिनट में पहुंचा देता है।
मार्च से जून और सितंबर से दिसंबर का समय त्रियुंड ट्रेक के लिए सबसे उपयुक्त है। जुलाई-अगस्त के मानसून में फिसलन के कारण ट्रेक बंद या कठिन हो जाता है।
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