बेताब घाटी (Betaab Valley)
चारों ओर बर्फानी चोटियों और विलो-चीड़ के पेड़ों से घिरी सुरम्य घाटी, जहां से लिद्दर नदी क्रिस्टल साफ पानी के साथ बहती है।
अनंतनाग जिले में कोलाहोई ग्लेशियर से निकलने वाली दूधिया लिद्दर नदी के संगम पर 2,130 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पहलगाम कश्मीर घाटी का सबसे शांत और सुरम्य पर्वतीय आश्रय है। कश्मीरी में 'पहलगाम' का अर्थ है 'चरवाहों का गांव' (विलेज ऑफ शेफर्ड्स)। चीड़, देवदार और फर के सघन वनों से आच्छादित यह घाटी 1983 की प्रसिद्ध फिल्म से नाम पाने वाली 'बेताब घाटी', शांत अल्पाइन गांव 'अरू', रोलिंग ग्रीन मीडोज वाले 'बैसरन' (जिसे भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है), और पवित्र अमरनाथ यात्रा के पारंपरिक पैदल मार्ग (चंदनवाड़ी) का प्रवेश द्वार है।
चारों ओर बर्फानी चोटियों और विलो-चीड़ के पेड़ों से घिरी सुरम्य घाटी, जहां से लिद्दर नदी क्रिस्टल साफ पानी के साथ बहती है।
पहलगाम से 5 किमी की ऊंचाई पर स्थित मखमली हरी घास का विशाल ढलानदार मैदान, जो घने देवदार के वनों से घिरा हुआ है।
पहलगाम से 12 किमी ऊपर स्थित शांत पारंपरिक कश्मीरी गांव, जो तरसर-मारसर और कोलाहोई ग्लेशियर ट्रेक का शुरुआती बिंदु है।
पहलगाम से 16 किमी दूर 2,895 मीटर पर स्थित बिंदु, जहां से पवित्र अमरनाथ गुफा की 32 किमी की पैदल व खच्चर यात्रा प्रारंभ होती है।
पहलगाम मूलतः बकरवाल और गद्दी चरवाहों की मौसमी बस्ती थी जो गर्मियों में अपनी भेड़ों और बकरियों के झुंड लेकर ऊंचे अल्पाइन चरागाहों की ओर जाते थे। 20वीं सदी के प्रारंभ में ब्रिटिश पर्यटकों और पर्वतारोहियों ने जब लिद्दर नदी में यूरोपियन ब्राउन ट्राउट मछली छोड़ी और यहां कैंपिंग शुरू की, तो यह मछली पकड़ने (Angling) और लंबी पैदल यात्रा का प्रमुख केंद्र बन गया। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर (1960-80 के दशक) में कश्मीर की अधिकांश रोमांटिक फिल्मों की शूटिंग इसी घाटी के देवदार वनों में हुई।
मूल रूप से 'हाजन घाटी' कहलाने वाली इस जगह का नाम 1983 में सनी देओल और अमृता सिंह की पहली ब्लॉकबस्टर फिल्म 'बेताब' की शूटिंग के बाद आधिकारिक तौर पर 'बेताब घाटी' पड़ गया। यहां लिद्दर नदी का जल इतना स्वच्छ और पारदर्शी है कि पानी में तैरती पत्थरों की एक-एक लकीर साफ दिखती है। नदी के किनारे लकड़ी के पुलों पर खड़े होकर पृष्ठभूमि में बर्फ से लदी पीर पंजाल की चोटियों को निहारना स्वर्गिक सुख का अनुभव कराता है।
पहलगाम मुख्य बाजार से केवल टट्टू (ट्रेकिंग पोनी) की सवारी या पैदल चढ़ाई द्वारा पहुंचा जा सकने वाला 'बैसरन' सचमुच स्विट्जरलैंड के अल्पाइन घास के मैदानों जैसा दिखता है। चारों ओर आकाश को छूते सीधे देवदार के पेड़ और बीच में दूर तक फैली हरी-भरी घास की मखमली चादर मन मोह लेती है। यहां से नीचे देखने पर पूरी पहलगाम बस्ती और लिद्दर नदी एक पतली चांदी की रेखा जैसी प्रतीत होती है।
पहलगाम सदियों से बाबा बर्फानी (अमरनाथ गुफा) की पावन छड़ी मुबारक यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। चंदनवाड़ी से चढ़ाई शुरू होकर पिस्सू टॉप, शेषनाग झील (3,570 मी.) और महागुणास दर्रा (4,270 मी.) होते हुए पवित्र हिमलिंग तक जाती है। इसके अतिरिक्त लिद्दर नदी भारत में 'ट्राउट फिशिंग' का प्रमुख केंद्र है, जहां मत्स्य विभाग से परमिट लेकर एंग्लर्स कांटे में ब्राउन और रेनबो ट्राउट पकड़ने का आनंद लेते हैं।
पहलगाम में बाहर की या श्रीनगर की गाड़ियों को इन तीनों घाटियों में जाने की अनुमति नहीं है। पहलगाम टैक्सी स्टैंड से स्थानीय यूनियन की अधिकृत मारुति ईको या सूमो टैक्सी फिक्स रेट पर किराए पर लेनी होती है।
बैसरन जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है। अधिकांश पर्यटक स्थानीय खच्चर/टट्टू (Pony) किराए पर लेकर जाते हैं। यदि आप फिट हैं, तो 1.5 घंटे की सुंदर पाइन फॉरेस्ट ट्रेकिंग करके भी पहुंचा जा सकता है।
पहलगाम से 12 किमी पहले 'यानेर' (Yaner) और 'मावल' में लिद्दर नदी पर ग्रेड-2 और ग्रेड-3 की रोमांचक रिवर राफ्टिंग कराई जाती है।
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