डल झील एवं कश्मीरी हाउसबोट्स
18 वर्ग किमी में फैली झील, जहां देवदार की लकड़ी से हाथ से तराशी गई विक्टोरियन शैली की हाउसबोट्स और तैरते बगीचे (राड) स्थित हैं।
हिमालय की पीर पंजाल और जबरवान पर्वतमालाओं के मध्य 1,585 मीटर की ऊंचाई पर झेलम नदी के दोनों तटों पर फैला श्रीनगर भारत का सबसे रोमानी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जल-नगर है। इतिहास के पन्नों में इसका उल्लेख 250 ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित 'श्रीनगरी' के रूप में मिलता है। डल झील और निगीन झील के शांत पानी पर तैरती नक्काशीदार देवदार की हाउसबोट्स, रंग-बिरंगे शिकारे, सुबह का फ्लोटिंग वेजिटेबल मार्केट, चिनार के विशाल वृक्षों की छांव में बने 17वीं सदी के मुगल बाग और 1,000 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित शंकराचार्य मंदिर श्रीनगर को धरती पर स्वर्ग का सच्चा साक्ष्य बनाते हैं।
18 वर्ग किमी में फैली झील, जहां देवदार की लकड़ी से हाथ से तराशी गई विक्टोरियन शैली की हाउसबोट्स और तैरते बगीचे (राड) स्थित हैं।
जबरवान पहाड़ी की ढलान पर डल झील को निहारते 12 सीढ़ीदार छतों वाले मुगल बाग, फव्वारे और 400 वर्ष पुराने विशाल चिनार के पेड़।
डल झील से 1,100 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित 200 ई.पू. का भगवान शिव का पाषाण मंदिर, जहां आदि शंकराचार्य जी ने साधना की थी।
डल झील के पश्चिमी तट पर स्थित श्वेत संगमरमर की भव्य दरगाह, जहां पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का पवित्र केश (मोई-ए-मुकद्दस) सुरक्षित है।
कल्हण की अमर ऐतिहासिक कृति 'राजतरंगिणी' के अनुसार कश्मीर घाटी कभी 'सतीसर' नामक एक विशाल झील थी जिसे महर्षि कश्यप ने बारामूला के पास पहाड़ काटकर सुखाया और बस्तियां बसाईं। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट अशोक ने यहां बौद्ध धर्म और शिव साधना के केंद्र के रूप में मूल श्रीनगरी की स्थापना की। 14वीं सदी में सूफी संतों, विशेषकर मीर सैयद अली हमदानी (शाह-ए-हमदान) के आगमन ने कश्मीर को कला, कालीन निर्माण, पश्मीना बुनाई और लकड़ी की नक्काशी का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बना दिया।
डल झील केवल एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि एक पूरी तैरती हुई सभ्यता है। सुबह 5:30 बजे झील के भीतरी हिस्से में लगने वाला 'फ्लोटिंग वेजिटेबल मार्केट' दुनिया के दुर्लभ नजारों में से एक है, जहां स्थानीय कश्मीरी अपनी चप्पू वाली नावों पर सब्जियां, ककड़ी, कमल ककड़ी (नद्रू) और ताजे फूल आपस में अदल-बदल करते हैं। शाम को शिकारे में लेटकर जब बोटमैन धीमी लय में चप्पू चलाता है और सूर्यास्त के समय जबरवान पहाड़ियों पर गुलाबी-सुनहरी किरणें बिखरती हैं, तो समय ठहर सा जाता है।
मुगल सम्राट जहांगीर और उनकी बेगम नूरजहां को कश्मीर से अगाध प्रेम था। जहांगीर ने 1619 में अपनी प्रिय बेगम के लिए 'शालीमार बाग' (प्रेम का उपवन) बनवाया, जबकि 1633 में आसिफ खान ने 12 सीढ़ीदार छतों वाला 'निशात बाग' तैयार किया। इन बागों में फारसी 'चारबाग' शैली के अनुसार जल प्रपात, नहरें और फव्वारे ढलान पर बहते हुए सीधे डल झील में मिलते हैं। पतझड़ (अक्टूबर-नवंबर) में चिनार के पत्तों का गहरा लाल-सुनहरा रंग पूरी घाटी को अग्नि सदृश दमकता बना देता है।
श्रीनगर का खानपान भारत की सबसे जटिल और समृद्ध पाक-कलाओं में से एक है। 36 व्यंजनों वाली शाही दावत 'वाजवान' को 'उस्ताद वाजा' पारंपरिक तांबे के बर्तनों में धीमी आंच पर पकाते हैं, जिसमें रोगन जोश, रिस्ता, गुश्ताबा और तबक माज प्रमुख हैं। शाकाहारियों के लिए कश्मीरी दम आलू, नद्रू यखनी और राजमा-चावल अद्वितीय स्वाद देते हैं। मिट्टी के कुल्हड़ या तांबे के समोवर से छनकर आने वाला केसर, इलायची और बादाम कतरन युक्त 'कश्मीरी कहवा' ठंड में शरीर में अमृत का संचार करता है।
हाउसबोट में ठहरना एक लक्जरी हेरिटेज अनुभव है। देवदार की नक्काशीदार दीवारों, कश्मीरी कालीनों और झील की ओर खुलती बालकनी से शिकारे और झील का शांत दृश्य दिखता है। डल और निगीन दोनों झीलों पर हाउसबोट उपलब्ध हैं।
एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन हर साल केवल वसंत ऋतु में, लगभग 20 मार्च से 25 अप्रैल तक (लगभग 30 दिनों के लिए) आम जनता के लिए खोला जाता है जब 15 लाख से अधिक ट्यूलिप खिलते हैं।
असली जीआई टैग वाली पश्मीना शॉल, पाम्पोर का शुद्ध केसर, हाथ से बुने सिल्क कालीन (कालेन), अखरोट की नक्काशीदार लकड़ी के डिब्बे, और पेपर मेशी के सजावटी सामान श्रीनगर की पहचान हैं।
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