तलकावेरी एवं ब्रह्मगिरि चोटी
1,276 मीटर पर एक छोटे कुंड के रूप में कावेरी नदी का पावन उद्गम, जहां से 365 सीढ़ियां चढ़कर ब्रह्मगिरि शिखर से घाटियों का दृश्य दिखता है।
कर्नाटक के दक्षिण-पश्चिम में पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पर्वतमाला की गोद में 1,170 मीटर की ऊंचाई पर बसा कूर्ग (स्थानीय नाम 'कोडगु') भारत का सबसे सुरम्य, सुगंधित और विशिष्ट पर्वतीय जिला है। ब्रिटिश काल में इसकी धुंधली पहाड़ियों, हरियाली और घुमावदार रास्तों के कारण इसे 'भारत का स्कॉटलैंड' (Scotland of India) कहा गया था। भारत की 40% कॉफी का उत्पादन करने वाले घने रोबस्टा और अरेबिका के बागान, दक्षिण भारत की जीवनदायिनी पवित्र कावेरी नदी का उद्गम स्थल 'तलकावेरी', घने जंगलों में गरजता 'एब्बे फॉल्स', बायलाकुप्पे में तिब्बती बौद्ध शरणार्थियों का विशाल 'नामद्रोलिंग स्वर्ण मंदिर', और मार्शल कौम 'कोडावा' की विशिष्ट योद्धा संस्कृति कूर्ग को एक अद्वितीय पहचान प्रदान करते हैं।
1,276 मीटर पर एक छोटे कुंड के रूप में कावेरी नदी का पावन उद्गम, जहां से 365 सीढ़ियां चढ़कर ब्रह्मगिरि शिखर से घाटियों का दृश्य दिखता है।
बायलाकुप्पे में स्थित भारत का दूसरा सबसे बड़ा तिब्बती बौद्ध मठ, जिसमें भगवान बुद्ध, पद्मसंभव और अमिताभ की 60 फीट ऊंची स्वर्ण प्रतिमाएं हैं।
मदिकेरी से 8 किमी दूर कॉफी और काली मिर्च के सघन बागानों के बीच 70 फीट की ऊंचाई से गर्जना के साथ गिरता दूधिया जलप्रपात।
कोडगु के राजाओं का पसंदीदा सूर्यास्त स्थल, जहां सुंदर फूलों के बगीचे और संगीतमय फव्वारों के बीच गहरी घाटियों पर धुंध उतरती है।
कूर्ग के मूल निवासी 'कोडावा' (Kodava) अपनी विशिष्ट शारीरिक बनावट, रीति-रिवाजों और सैन्य वीरता के लिए पूरे भारत में विख्यात हैं। भारत के प्रथम सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा और जनरल के.एस. थिमैया इसी वीर भूमि के सपूत थे। कोडावा समुदाय को बिना किसी लाइसेंस के बंदूक रखने की ऐतिहासिक कानूनी छूट प्राप्त है क्योंकि हथियार उनकी पारंपरिक पूजा ('कैल्पोढ़' उत्सव) का अभिन्न अंग हैं। पुरुषों का पारंपरिक काला परिधान 'कुप्या' और कमर में बंधी पारंपरिक कटार 'पिचेकट्टी' इस संस्कृति की शान है।
ब्रह्मगिरि पर्वत की चोटी पर स्थित तलकावेरी दक्षिण भारत के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि अगस्त्य के कमंडल में बंद कावेरी को भगवान गणेश ने कौवे का रूप धरकर छलकाया था जिससे नदी प्रवाहित हुई। प्रत्येक वर्ष तुला संक्रांति (मध्य अक्टूबर) के दिन यहां 'तीर्थोद्भव' पर्व मनाया जाता है, जब एक निश्चित शुभ मुहूर्त में कुंड से अचानक जल उफनकर बाहर निकलता है और हजारों श्रद्धालु इस पवित्र जल में स्नान करते हैं।
कूर्ग के पूर्वी छोर पर स्थित बायलाकुप्पे भारत की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक है जिसे 1960 के दशक में बसाया गया था। यहां का 'नामद्रोलिंग मोनेस्ट्री' (Namdroling Monastery) अपनी तिब्बती वास्तुकला, रंग-बिरंगे भित्ति चित्रों और प्रार्थना पहियों के लिए जाना जाता है। मंदिर के मुख्य हॉल में स्थापित 60 फीट ऊंची तीन स्वर्ण प्रतिमाएं अंतर्मन को शांति से भर देती हैं। यहां के बाजारों में तिब्बती थांगका, मोमोज और हस्तनिर्मित कालीन मिलते हैं।
कूर्ग में किसी होमस्टे या प्लांटेशन एस्टेट में ठहरना यहां का सबसे प्रामाणिक अनुभव है। सुबह पक्षियों की चहचहाहट और ताजी भुनी हुई कॉफी की खुशबू के साथ जागना एक अनोखा सुख है। स्थानीय भोजन में कच्चे कचंपुली (जंगली फल का सिरका) में पका तीखा 'पांडि करी' (पारंपरिक पोर्क करी), चावल के नूडल्स 'कदंबट्टू' और 'नूल्पुट' अत्यंत लोकप्रिय हैं। शाकाहारियों के लिए बांस के कोपलों (बम्बू शूट) की करी और कद्दू का सांभर विशेष रूप से बनाया जाता है।
निकटतम हवाई अड्डा कन्नूर (CNN - 90 किमी) और मंगलुरु (IXE - 135 किमी) है। निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन (120 किमी) है जहां से बस या टैक्सी द्वारा 3 घंटे में मदिकेरी पहुंचा जा सकता है।
अरेबिका कॉफी की तुड़ाई नवंबर से जनवरी के मध्य और रोबस्टा कॉफी की तुड़ाई जनवरी से मार्च के मध्य होती है। इस समय बागानों में कॉफी के लाल फल देखने को मिलते हैं।
नहीं, सुरक्षा कारणों से एब्बे फॉल्स के पानी में उतरना या नहाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। पर्यटकों के लिए झरने के सामने एक सुरक्षित हैंगिंग ब्रिज बनाया गया है जहां से सुंदर तस्वीरें ली जा सकती हैं।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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