चीनी मछली पकड़ने के जाल (चीनावाला)
14वीं सदी में चीनी खोजकर्ता चेंग ही द्वारा लाए गए 10 मीटर ऊंचे बांस और सागौन के कैंटिलीवर जाल, जो विशाल पत्थरों के काउंटरवेट से चलते हैं।
अरब सागर और वेम्बनाड बैकवाटर्स के मुहाने पर बसा फोर्ट कोच्चि भारत के समुद्री इतिहास की सबसे सम्मोहक और बहुसांस्कृतिक खिड़की है। 1341 ई. में पेरियार नदी की भीषण बाढ़ से प्राचीन मुजिरिस बंदरगाह के नष्ट होने के बाद अस्तित्व में आया कोच्चि सदियों तक अरबों, चीनियों, पुर्तगालियों, डच और अंग्रेजों के वैश्विक मसाला व्यापार की धुरी रहा। सूर्यास्त के समय तट पर सिलुएट बनाते कुबलई खान के दरबार से आए विशाल चीनी जाल ('चीनावाला'), 1503 में निर्मित भारत का पहला यूरोपीय चर्च 'सेंट फ्रांसिस' (जहां वास्को डी गामा को दफनाया गया था), 450 वर्ष पुराना पारदेसी यहूदी सिनेगॉग, और मट्टनचेरी का डच पैलेस फोर्ट कोच्चि को समय के पार ले जाने वाला जीवंत संग्रहालय बनाते हैं।
14वीं सदी में चीनी खोजकर्ता चेंग ही द्वारा लाए गए 10 मीटर ऊंचे बांस और सागौन के कैंटिलीवर जाल, जो विशाल पत्थरों के काउंटरवेट से चलते हैं।
1503 में पुर्तगाली फ्रांसिस्कन भिक्षुओं द्वारा निर्मित भारत का पहला यूरोपीय चर्च, जहां 1524 में महान खोजकर्ता वास्को डी गामा को दफनाया गया था।
1555 में पुर्तगालियों द्वारा कोच्चि के राजा को भेंट किया गया महल, जिसकी दीवारों पर रामायण और महाभारत के भारत के सर्वश्रेष्ठ भित्ति चित्र हैं।
1568 में बना राष्ट्रमंडल का सबसे पुराना सक्रिय यहूदी उपासना गृह, जिसमें 18वीं सदी के हाथ से रंगे चीनी मिट्टी के टाइल्स और बेल्जियम के झूमर हैं।
1341 तक प्राचीन मुजिरिस (आधुनिक कोडुंगल्लूर) विश्व का सबसे बड़ा मसाला बंदरगाह था जहां रोमन और यूनानी जहाज काली मिर्च (काला सोना) खरीदने आते थे। एक भीषण चक्रवाती बाढ़ ने मुजिरिस को बालू से पाट दिया और कोच्चि में एक नया गहरा प्राकृतिक जलडमरूमध्य खोल दिया। 1500 में पेड्रो अल्वारेस कैबरल और 1502 में वास्को डी गामा यहां पहुंचे। 1503 में राजा की अनुमति से पुर्तगालियों ने 'फोर्ट मैनुअल' बनाया जो भारत की भूमि पर किसी भी यूरोपीय शक्ति द्वारा निर्मित पहला सैन्य किला था।
फोर्ट कोच्चि के समुद्र तट पर कतारबद्ध खड़े 'चीनी मछली पकड़ने के जाल' (Chinese Fishing Nets) दुनिया में चीन के बाहर केवल यहीं देखने को मिलते हैं। माना जाता है कि 14वीं शताब्दी में चीनी सम्राट कुबलई खान के राजदूत इन्हें कोच्चि लाए थे। यह जाल विशुद्ध भौतिकी (संतुलन और उत्तोलक सिद्धांत) पर काम करता है। छह नाविक जब विशाल पत्थरों से बंधे रस्सियों पर अपना वजन डालते हैं, तो 20 मीटर चौड़ा जाल पानी से बाहर उठता है और उसमें चमकती हुई मछलियां छटपटाती हैं। सूर्यास्त के समय इन जालों की छाया फोटोग्राफरों का स्वप्नलोक बन जाती है।
फोर्ट कोच्चि से 3 किमी दूर मट्टनचेरी की संकरी गलियों में कदम रखते ही हवा में लौंग, दालचीनी, अदरक और इलायची की तीखी खुशबू आने लगती है। 'जुइश टाउन' में कभी स्पेन और पुर्तगाल से निष्कासित सेफार्डिक यहूदी रहते थे। 1568 में बने 'पारदेसी सिनेगॉग' का फर्श कैंटन (चीन) से मंगाए गए 1,100 हाथ से पेंट किए गए नीले-सफेद पोर्सिलेन टाइल्स से बना है, जिसमें हर टाइल का डिजाइन एक-दूसरे से भिन्न है। यहां आज भी प्राचीन हिब्रू तोराह स्क्रॉल सुरक्षित हैं।
फोर्ट कोच्चि कला और बौद्धिक संवाद का वैश्विक केंद्र है। पुरानी पुर्तगाली और डच कोठियों को बुटीक होटलों, आर्ट कैफे (जैसे काशी आर्ट कैफे) और किताबों की दुकानों में बदल दिया गया है। शाम को 'केरल कथकली केंद्र' में 2 घंटे पहले जाकर कलाकारों को अपने चेहरे पर प्राकृतिक रंगों से जटिल मेकअप (चुट्टी) करते देखना और उसके बाद भावपूर्ण कथकली व कलारिपयट्टू (मार्शल आर्ट) देखना एक अविस्मरणीय अनुभव होता है। दिसंबर में यहां एशिया का सबसे बड़ा समकालीन कला महोत्सव 'कोच्चि-मुजिरिस बिनाले' आयोजित होता है।
वास्को डी गामा की मृत्यु 1524 में कोच्चि में ही हुई थी और उन्हें फोर्ट कोच्चि के सेंट फ्रांसिस चर्च में दफनाया गया था। 14 वर्ष बाद (1538 में) उनके अवशेषों को पुर्तगाल (लिस्बन) ले जाया गया, किंतु उनकी मूल समाधि का पत्थर आज भी इस चर्च में देखा जा सकता है।
एर्नाकुलम जेट्टी से फोर्ट कोच्चि के लिए सरकारी फेरी (Water Metro / Ferry) मात्र ₹6 में उपलब्ध है जो 20 मिनट में पहुंचा देती है। यह सड़क मार्ग (टैक्सी से 1 घंटा) की तुलना में बहुत तेज और दर्शनीय है।
सिनेगॉग शुक्रवार और शनिवार (यहूदी सब्त) को बंद रहता है; बाकी दिन सुबह 10:00 से 12:00 और दोपहर 3:00 से 5:00 तक खुला रहता है। डच पैलेस शुक्रवार को बंद रहता है।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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