इरावीकुलम राष्ट्रीय उद्यान एवं अनामुदी
97 वर्ग किमी में फैला अल्पाइन शोला घास का मैदान, जहां खड़ी चट्टानों पर विचरती दुर्लभ नीलगिरि तहर और अनामुदी चोटी स्थित है।
पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) की इडुक्की पर्वतमाला में 1,600 मीटर की ऊंचाई पर तीन पहाड़ी नदियों—मुथिरापुझा, नल्लाथन्नी और कुंडाली—के संगम पर बसा मुन्नार दक्षिण भारत का सबसे विख्यात और चित्ताकर्षक पर्वतीय स्थल है। मलयालम में 'मुन्नार' का अर्थ ही 'तीन नदियां' होता है। मीलों दूर तक फैले रोलिंग टी-एस्टेट्स (चाय बागान), दक्षिण भारत का सर्वोच्च 2,695 मीटर ऊंचा 'अनामुदी शिखर', लुप्तप्राय पर्वतीय बकरी 'नीलगिरि तहर' का प्राकृतिक वास इरावीकुलम राष्ट्रीय उद्यान, और 12 वर्ष में एक बार खिलने वाला जादुई 'नीलकुरिंजी' पुष्प मुन्नार को प्रकृति की अमर कृति बनाते हैं।
97 वर्ग किमी में फैला अल्पाइन शोला घास का मैदान, जहां खड़ी चट्टानों पर विचरती दुर्लभ नीलगिरि तहर और अनामुदी चोटी स्थित है।
1880 के दशक से मुन्नार में चाय उद्योग के इतिहास, पहली रोलर मशीन, चाय प्रसंस्करण और चाय टेस्टिंग का ऐतिहासिक केंद्र।
1,700 मीटर पर स्थित कंक्रीट ग्रैविटी डैम, जहां शांत जल में स्पीड बोटिंग और पहाड़ी घाटी में प्राकृतिक प्रतिध्वनि (Echo) का अनुभव होता है।
केरल-तमिलनाडु सीमा पर 1,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सर्वोच्च बिंदु, जहां से पश्चिमी घाट की घाटियों पर तैरते बादलों का विहंगम दृश्य दिखता है।
1870 के दशक में ब्रिटिश रेजिडेंट जॉन डैनियल मुनरो जब पूंजार राजघराने से शिकार हेतु अनुमति लेकर मुन्नार पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि यहां की नम पर्वतीय जलवायु और ढलानें चाय की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। 1880 के दशक में ए.एच. शार्प ने पहला चाय का पौधा रोपा। बाद में जेम्स फिनले एंड कंपनी और आगे चलकर टाटा टी ने इसे विश्व के सबसे बड़े चाय उत्पादक क्षेत्रों में बदल दिया। आज मुन्नार के सीढ़ीदार चाय बागान ऐसे दिखते हैं मानो किसी ने पहाड़ियों पर मखमली हरा कालीन बिछा दिया हो।
इरावीकुलम राष्ट्रीय उद्यान मुन्नार का सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण क्षेत्र है। यहां समुद्र तल से 2,000 मीटर ऊपर शोला वन (अल्पाइन घास के मैदान और घने बौने पेड़ों का अनोखा मिश्रण) फैले हैं। यह उद्यान 'नीलगिरि तहर' (Nilgiri Tahr) का मुख्य गढ़ है, जो बकरे जैसी दिखने वाली अत्यंत फुर्तीली पर्वतीय बकरी है। यहां तहर पर्यटकों के काफी नजदीक बिना डरे चरती दिखती हैं। हर 12 वर्ष में (पिछली बार 2018 में, अगली बार 2030 में) जब नीलकुरिंजी के नीले-बैंगनी फूल पूरी पहाड़ियों को ढक लेते हैं, तो यह घाटी स्वर्ग सदृश आभा बिखेरती है।
मुन्नार से टॉप स्टेशन की 32 किमी की सड़क भारत के सबसे सुंदर ड्राइव्स में गिनी जाती है। रास्ते में मट्टुपेट्टी बांध के जलाशय में जंगली हाथियों के झुंड पानी पीते देखे जा सकते हैं। कुंडल झील पर एशिया का पहला आर्च डैम बना है जहां कश्मीरी शिकारे जैसी नावों में बोटिंग होती है। अनायिरंगल (Anayirangal) बांध चारों ओर घने जंगलों और चाय बागानों से घिरा एक शांत जल नखलिस्तान है।
मुन्नार केवल आंखों के लिए ही नहीं, सुगंध और स्वाद के लिए भी जाना जाता है। यहां के मसाला बागानों (स्पाइस प्लांटेशन्स) में दालचीनी, इलायची, लौंग, काली मिर्च और जायफल के पौधे देखे जा सकते हैं। स्थानीय भोजनालयों में केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला केरल 'सद्या' (पारंपरिक शाकाहारी थाली), अप्पम के साथ वेज या चिकन स्ट्यू, और मालाबार पराठा अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं। वापसी में टी म्यूजियम से ताजी तोड़ी गई सीटीसी व ऑर्थोडॉक्स ब्लैक और व्हाइट टी खरीदना यात्रियों का मुख्य आकर्षण होता है।
इरावीकुलम की टिकटें वन विभाग के आधिकारिक पोर्टल eravikulamnationalpark.in से ऑनलाइन बुक की जा सकती हैं। ध्यान रहे कि नीलगिरि तहर के प्रजनन काल के कारण यह पार्क प्रतिवर्ष फरवरी और मार्च में बंद रहता है।
कोच्चि (एर्नाकुलम) से मुन्नार की दूरी 125 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा चीयापारा और वालारा जलप्रपातों को देखते हुए टैक्सी या केएसआरटीसी बस से 3.5 से 4 घंटे का समय लगता है।
नीलकुरिंजी 12 वर्ष में एक बार खिलता है। यह अंतिम बार 2018 में खिला था और अब इसका अगला महा-पुष्पन वर्ष 2030 में संभावित है।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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