एडक्कल गुफाएं (Edakkal Caves)
अंबुकुथी पहाड़ी पर 1,200 मीटर पर स्थित दो प्राकृतिक पाषाण शिला-खंड, जिनकी दीवारों पर 6,000 वर्ष पुराने मानव आकृतियों, पशुओं और पहियों के आदिम चित्र हैं।
केरल के उत्तर-पूर्वी छोर पर कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमाओं से सटी पश्चिमी घाट की नीलगिरि बायोस्फीयर पर्वतमाला में 700 से 2,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वायनाड राज्य का सबसे हरा-भरा और जैव-विविधता से संपन्न पर्वतीय जिला है। मलयालम शब्द 'वयाल-नाडु' का अर्थ होता है 'धान के खेतों की भूमि'। 6,000 वर्ष प्राचीन नवपाषाण (Neolithic) शैलचित्रों वाली रहस्यमयी 'एडक्कल गुफाएं', भारत का सबसे बड़ा और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मिट्टी का बांध 'बाणासुर सागर', बादलों को छूती 2,100 मीटर ऊंची चेम्ब्रा चोटी पर प्राकृतिक 'हार्ट-शेप्ड लेक' (हृदयाकार झील), और जंगली हाथियों का अभयारण्य मुथंगा वायनाड को आदिम प्रकृति का अद्वितीय उपहार बनाते हैं।
अंबुकुथी पहाड़ी पर 1,200 मीटर पर स्थित दो प्राकृतिक पाषाण शिला-खंड, जिनकी दीवारों पर 6,000 वर्ष पुराने मानव आकृतियों, पशुओं और पहियों के आदिम चित्र हैं।
विशाल मिट्टी का बांध जिसके जलाशय में जल स्तर बढ़ने पर छोटी-छोटी पहाड़ियां छोटे द्वीपों की तरह तैरती नजर आती हैं, स्पीड बोटिंग हब।
2,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वायनाड का सर्वोच्च शिखर, जहां के रास्ते में 1,500 मीटर पर कभी न सूखने वाली प्राकृतिक दिल के आकार की झील है।
चारों ओर सदाबहार जंगलों से घिरी प्राकृतिक मीठे पानी की झील, जो भारत के नक्शे के आकार में फैली है; कयाकिंग और पेडल बोटिंग केंद्र।
वायनाड का इतिहास कोटायम के वीर शासक 'पझासी राजा' (केरल वर्मा) के अदम्य साहस से जुड़ा है। 18वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मालाबार पर भारी कर थोपे, तो पझासी राजा ने स्थानीय कुरिचिया आदिवासी तीरंदाजों के साथ मिलकर वायनाड के बीहड़ बांस के जंगलों में अंग्रेजों के खिलाफ भारत का पहला सफल गुरिल्ला युद्ध लड़ा। आर्थर वेलेस्ली (ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) जैसे महान ब्रिटिश जनरल भी पझासी राजा को वर्षों तक नहीं पकड़ सके।
1890 में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी फ्रेड फॉसेट ने शिकार के दौरान अंबुकुथी पहाड़ी पर एक विशाल प्राकृतिक दरार देखी जो एक बड़े पाषाण के गिरने से गुफा जैसी बन गई थी। एडक्कल का अर्थ है 'बीच में फंसा पत्थर'। पुरातत्वविदों के अनुसार इसकी दीवारों पर उकेरे गए चित्र नवपाषाण काल (6,000 से 1,000 ई.पू.) के हैं। इन चित्रों में मुकुट पहने मनुष्य, धनुष-बाण, नाचती महिलाएं, पहिए और हड़प्पा लिपि जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं जो यह साबित करते हैं कि दक्षिण भारत में प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता कितनी उन्नत थी।
असुर राजा बाणासुर (भगवान शिव के भक्त) के नाम पर बने बाणासुर सागर बांध की इंजीनियरिंग विस्मयकारी है। बिना कंक्रीट की मुख्य दीवार के, केवल पत्थरों और विशेष चिकनी मिट्टी को कूट-कूट कर इस विशाल जलाशय को रोका गया है। जलाशय के बीच तैरते हरे-भरे द्वीप न्यूजीलैंड के दृश्यों की याद दिलाते हैं। दूसरी ओर चेम्ब्रा पीक का ट्रेक वन विभाग की अनुमति से शुरू होता है। 3 घंटे की चढ़ाई के बाद जब हरे घास के मैदान में प्राकृतिक 'हृदयाकार झील' (Love Lake) दिखती है, तो ट्रेकर्स मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
वायनाड भारत के प्रमुख रोबस्टा कॉफी उत्पादक जिलों में से एक है। नवंबर से जनवरी के बीच जब कॉफी के लाल चेरी फल पकते हैं और सफेद फूल खिलते हैं, तो पूरी घाटी में मीठी सुगंध फैल जाती है। इसके अलावा यहां की कुरिचिया और पनिया जनजातियां बांस और बेंत से अद्भुत हस्तशिल्प बनाती हैं। भोजन में मालाबार स्टाइल का घी राइस, मटन करी, केले के चिप्स और शुद्ध जंगली शहद वायनाड की पहचान हैं।
एडक्कल गुफाओं के लिए पार्किंग से लगभग 1 किमी की खड़ी चढ़ाई और अंत में लोहे की लगभग 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। इसमें 45 मिनट से 1 घंटा लगता है। बुजुर्गों और घुटने की समस्या वाले लोगों के लिए यह थोड़ा कठिन हो सकता है (सोमवार बंद)।
चेम्ब्रा ट्रेक का परमिट मेप्पाडी स्थित वन विभाग कार्यालय से उसी दिन सुबह 7:00 बजे 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर मिलता है। प्रतिदिन केवल 200 पास ही जारी किए जाते हैं।
वायनाड में दो प्रमुख सफारी केंद्र हैं: मुथंगा (Muthanga) और तोलपेट्टी (Tholpetty)। यहां सुबह 6:30 से 9:00 और दोपहर 3:00 से 5:30 तक वन विभाग की जिप्सी से सफारी कराई जाती है जहां हाथी, गौर (बायसन), हिरण और बाघ देखने को मिलते हैं।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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