द्रास कारगिल युद्ध स्मारक (ऑपरेशन विजय)
तोलोलिंग की पृष्ठभूमि में बना अमर जवान ज्योति स्मारक, मनोज पांडे गैलरी और कैप्टन विक्रम बत्रा की अमर शहादत का स्मृति स्थल।
श्रीनगर और लेह के मध्य राष्ट्रीय राजमार्ग 1 पर सुरु नदी के तट पर 2,676 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कारगिल भारतीय सैन्य शौर्य, अदम्य साहस और ट्रांस-हिमालयी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। 1999 के भारत-पाकिस्तान कारगिल युद्ध में 'ऑपरेशन विजय' के दौरान भारतीय सेना द्वारा तोलोलिंग, टाइगर हिल और बटालिक की बर्फीली चोटियों पर रचे गए अदम्य इतिहास की स्मृति में बना 'द्रास वॉर मेमोरियल' प्रत्येक भारतीय के हृदय में गर्व भर देता है। इसके अतिरिक्त साइबेरिया के बाद विश्व का दूसरा सबसे ठंडा आबाद क्षेत्र 'द्रास', 7,135 मीटर ऊंची नुन-कुन चोटियों वाली हरी-भरी 'सुरु घाटी' और 8वीं सदी की मुलबेक चंबा शैलकृत मैत्रेय प्रतिमा कारगिल को समृद्ध बनाते हैं।
तोलोलिंग की पृष्ठभूमि में बना अमर जवान ज्योति स्मारक, मनोज पांडे गैलरी और कैप्टन विक्रम बत्रा की अमर शहादत का स्मृति स्थल।
कारगिल से जांस्कर की ओर जाने वाली हरी-भरी घाटी, जहां लद्दाख की दो सर्वोच्च हिमाच्छादित चोटियां नुन (7,135 मी.) और कुन (7,077 मी.) स्थित हैं।
कारगिल-लेह मार्ग पर एक विशाल एकाश्म खड़ी चट्टान पर तराशी गई 8 मीटर ऊंची भगवान मैत्रेय (भावी बुद्ध) की प्राचीन प्रतिमा।
नियंत्रण रेखा (LoC) के निकट स्थित सदियों पुराना गांव, जो 1971 के युद्ध के बाद भारत का हिस्सा बना; इसमें दुर्लभ सीमांत संग्रहालय है।
कारगिल का ऐतिहासिक नाम 'पुरिक' था और यहां के मूल निवासियों को पुरिक-पा कहा जाता है जो तिब्बती और दार्द (Dard) नस्ल का मिश्रण हैं। मध्यकाल में यह क्षेत्र बाल्टिस्तान, लद्दाख, कश्मीर और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक काफिलों का महत्वपूर्ण मिलन स्थल था जहां से पश्मीना ऊन और खुबानी का व्यापार होता था। 14वीं-15वीं सदी में मीर शम्सुद्दीन इराकी के प्रभाव से यहां इस्लाम का शिया मत फैला, जिससे कारगिल में ईरानी और बाल्टी स्थापत्य की सुंदर मस्जिदें और इमामबाड़े बने।
द्रास में तोलोलिंग पहाड़ी की तलहटी में स्थित कारगिल वॉर मेमोरियल में कदम रखते ही आंखें नम और सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी दीवार पर ऑपरेशन विजय में शहीद हुए 527 वीर सैनिकों के नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। कैप्टन विक्रम बत्रा (परमवीर चक्र), कैप्टन मनोज कुमार पांडे और मेजर विवेक गुप्ता जैसे वीरों की व्यक्तिगत डायरियां, तस्वीरें और पाकिस्तानी सेना से छीने गए बंकर व हथियार यहां सुरक्षित हैं। हर वर्ष 26 जुलाई को यहां भव्य 'कारगिल विजय दिवस' मनाया जाता है।
अधिकांश पर्यटक कारगिल को केवल श्रीनगर-लेह के बीच एक रात के ठहराव के रूप में देखते हैं, किंतु कारगिल से दक्षिण की ओर मुड़ने वाली 'सुरु घाटी' लद्दाख की सबसे सुंदर घाटियों में से एक है। शंको, पानीखर और पारकाचिक से गुजरते हुए चिनार, विलो और खुबानी के पेड़ों से लदी यह घाटी नुन और कुन की 7,000+ मीटर ऊंची हिमाच्छादित चोटियों के ठीक नीचे फैली है। पारकाचिक ग्लेशियर का विशाल हिमखंड सड़क के बिल्कुल निकट आकर समाप्त होता है।
कारगिल से लेह की ओर 45 किमी आगे बढ़ने पर बौद्ध प्रभाव शुरू होता है जहां मुलबेक गांव में सड़क किनारे एक खड़ी चट्टान पर 8वीं सदी में कुषाण काल के प्रभाव वाली मैत्रेय बुद्ध की 30 फीट ऊंची मूर्ति उकेरी गई है। कारगिल पूरे देश में अपनी 'रक्तसे कारपो' (Raktsey Karpo) खुबानी (Apricot) के लिए विख्यात है जो अत्यंत मीठी और रसदार होती है। स्थानीय बाजार में खुबानी का तेल, सूखे मेवे और बाल्टी पारंपरिक ब्रेड्स का स्वाद अवश्य लेना चाहिए।
वॉर मेमोरियल प्रतिदिन सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक खुला रहता है। यहां प्रवेश निःशुल्क है किंतु मूल भारतीय पहचान पत्र (आधार/वोटर आईडी) दिखाना अनिवार्य होता है।
श्रीनगर से लेह की दूरी 420 किमी है जो ऊंचे दर्रों (ज़ोजिला, फतु ला, नामिका ला) के कारण एक दिन में तय करना अत्यंत थकाऊ और जोखिम भरा होता है। कारगिल में रात का ठहराव यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाता है।
ताजी खुबानी जुलाई और अगस्त के महीनों में पेड़ों से तोड़ी जाती है, जबकि सूखी खुबानी और उसका शुद्ध तेल पूरे साल कारगिल के बाजारों में उपलब्ध रहता है।
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