शनिवार वाड़ा
1732 में पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा निर्मित 7-मंजिला मराठा प्रासाद, जिसका 'दिल्ली दरवाजा' नुकीली कीलों और बुर्जों से अभेद्य है।
सह्याद्रि की हरी-भरी उपत्यकाओं में मुला और मुठा नदियों के संगम पर 560 मीटर की ऊंचाई पर बसा पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक, शैक्षणिक और ऐतिहासिक आत्मा है। 17वीं सदी में छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी माता जीजाबाई की छत्रछाया में विकसित यह नगर 18वीं शताब्दी में बाजीराव प्रथम और पेशवाओं के काल में मराठा साम्राज्य का केंद्रीय सत्ता केंद्र बना। 1732 में निर्मित शनिवार वाड़ा की अभेद्य प्राचीरें, तानाजी मालुसरे के बलिदान से अमर सिंहगढ़ दुर्ग, महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का गवाह आगा खान पैलेस और श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति पुणे को ज्ञान, शौर्य और भक्ति की त्रिवेणी बनाते हैं।
1732 में पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा निर्मित 7-मंजिला मराठा प्रासाद, जिसका 'दिल्ली दरवाजा' नुकीली कीलों और बुर्जों से अभेद्य है।
पुणे से 30 किमी दूर 1,312 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित दुर्ग, जहां 1670 में वीर तानाजी मालुसरे ने अपने प्राण देकर मराठा ध्वज फहराया था।
1892 में सुल्तान मुहम्मद शाह आगा खान तृतीय द्वारा निर्मित इतालवी मेहराबों वाला महल, जहां 1942 में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी को नजरबंद रखा गया था।
1893 में स्थापित महाराष्ट्र का अत्यंत जाग्रत गणेश मंदिर, जहां गणेशोत्सव के दौरान लाखों भक्त सुवर्ण आभूषणों से सज्जित बप्पा के दर्शन करते हैं।
पुणे का आधुनिक इतिहास तब शुरू हुआ जब शहाजीराजे भोसले ने अपनी पत्नी जीजाबाई और बालक शिवाजी को यहां का जागीरदार बनाया। जीजाबाई ने टूटे-फूटे कस्बे में सोने का हल चलवाकर नवजीवन का संचार किया और 'लाल महल' का निर्माण कराया जहां शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान की उंगलियां काटकर मुगल घमंड चूर किया था। 1730 के दशक में पेशवा बाजीराव प्रथम ने शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाकर पुणे को अटक से कटक तक फैले विशाल मराठा साम्राज्य की राजधानी बना दिया।
शनिवार वाड़ा का प्रवेश द्वार 'दिल्ली दरवाजा' उत्तर दिशा की ओर इस गर्व के साथ बनाया गया था कि मराठा सत्ता का लक्ष्य दिल्ली का तख्त है। इस विशाल लकड़ी के दरवाजे पर हाथियों के धक्कों से बचाव के लिए 72 बड़ी लोहे की नुकीली कीलें लगी हैं। वाड़ा के भीतर कभी हजारी कारंजे (हजार फव्वारों वाला कमल कुंड), मेघडंबरी और सात मंजिला महल हुआ करते थे, जो 1828 की भीषण रहस्यमयी आग में भस्म हो गए, किंतु इसकी विशाल पाषाण दीवारें आज भी मराठा वैभव की गवाही देती हैं।
सह्याद्रि की खड़ी चट्टान पर स्थित सिंहगढ़ दुर्ग ट्रेकर्स और इतिहास प्रेमियों का तीर्थ है। 1670 में शिवाजी महाराज के सेनापति तानाजी मालुसरे ने रात के अंधेरे में घोरपड़ (गोह) 'यशावंती' की सहायता से दुर्ग की अभेद्य खड़ी चट्टान पर चढ़कर उदयभान राठौड़ से भयंकर युद्ध किया। तानाजी के वीरगति प्राप्त करने पर छत्रपति ने विलाप करते हुए कहा था—'गढ़ आला पण सिंह गेला' (किला तो हाथ आया किंतु मेरा सिंह चला गया)। दुर्ग पर आज भी तानाजी की समाधि, देवटाके (मीठे पानी के प्राकृतिक कुंड) और गरमा-गरम पिठला-भाकरी मिलती है।
पुणे अपने बौद्धिक मिजाज, मराठी रंगमंच, गणेशोत्सव की ढोल-ताशा टोलियों और अद्वितीय स्वाद के लिए जाना जाता है। काटाकिर्र या काटा-मिसल की तीखी तरीदार 'पुणेरी मिसल', फर्ग्युसन कॉलेज रोड की वैशाली कैफे की फिल्टर कॉफी, और डेक्कन जिमखाना के पास 'चितले बंधु' की कुरकुरी मसालेदार 'बाकरवड़ी' और आम्रखंड के बिना पुणे की कोई भी यात्रा अधूरी है।
भाद्रपद मास में 10 दिवसीय गणेशोत्सव के दौरान 'मानाचे ५ गणपति' (कसबा, तांबड़ी जोगेश्वरी, गुरुजी तालीम, तुलसीबाग, केसरीवाड़ा) के दर्शन और अनंत चतुर्दशी के दिन लाखों युवाओं की पारंपरिक 'ढोल-ताशा' वादन देखना एक अद्भुत अनुभव है।
पुणे शहर से सिंहगढ़ की तलहटी (अतकरवाड़ी) तक कार/बस से 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है। वहां से ऊपर दुर्ग तक पक्की सड़क जाती है, अथवा 1.5 घंटे की रोमांचक ट्रेकिंग की जा सकती है।
शनिवार वाड़ा में प्रतिदिन शाम 7:15 बजे मराठी में और 8:15 बजे अंग्रेजी में मराठा इतिहास को दर्शाने वाला लाइट एंड साउंड शो आयोजित किया जाता है।
किलों, महलों, गुफाओं और तीर्थों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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