ग्वालियर किला एवं मान मंदिर महल
1508 में राजा मानसिंह तोमर द्वारा निर्मित 4-मंजिला महल, जिसकी बाहरी दीवारों पर नीली, पीली और हरी टाइलों से बतख, हाथी और मयूर उकेरे हैं।
मध्य प्रदेश के उत्तरी अंचल में चंबल और बुंदेलखंड के मिलन स्थल पर 300 फीट ऊंची खड़ी बलुआ पत्थर की गोपाचल पहाड़ी पर शान से खड़ा ग्वालियर किला सदियों से भारत का सबसे प्रतिष्ठित सैन्य गढ़ रहा है। मुगल सम्राट बाबर ने जिसे 'हिंदुस्तान के किलों के हार का मोती' (The pearl among the fortresses of Hind) कहा था, वह ग्वालियर तोमर राजा मानसिंह के प्रेम और स्थापत्य के स्मारक मान मंदिर, संगीत सम्राट तानसेन की समाधि, 100 फीट ऊंचे द्रविड़ शैली के तेली का मंदिर, और सिंधिया राजवंश के 400 कमरों वाले भव्य जय विलास पैलेस का गौरवशाली स्वामी है।
1508 में राजा मानसिंह तोमर द्वारा निर्मित 4-मंजिला महल, जिसकी बाहरी दीवारों पर नीली, पीली और हरी टाइलों से बतख, हाथी और मयूर उकेरे हैं।
1874 में महाराजा जयाजीराव सिंधिया द्वारा निर्मित वर्साय शैली का प्रासाद, जिसके दरबार हॉल में विश्व के दो सबसे विशाल 3,500 किलो के झूमर लटके हैं।
अकबर के नवरत्नों में शामिल तानसेन की शांतिपूर्ण समाधि, जहां हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय तानसेन संगीत समारोह का आयोजन होता है।
1093 का महीन नक्काशीदार सहस्त्रबाहु (विष्णु) मंदिर और उत्तर भारत में द्रविड़ शिखर वाला 100 फीट ऊंचा 8वीं सदी का तेली का मंदिर।
8वीं शताब्दी में राजा सूरज सेन नामक एक स्थानीय सरदार को कुष्ठ रोग हो गया था। गोपाचल पहाड़ी पर रहने वाले तपस्वी संत ग्वालिपा ने उन्हें एक पवित्र कुंड (सूरज कुंड) का जल पिलाया जिससे उनका रोग तत्काल ठीक हो गया। कृतज्ञ राजा ने संत के नाम पर इस नगर का नाम 'ग्वालियर' रखा और पहाड़ी पर किले की नींव रखी। 15वीं सदी में राजा मानसिंह तोमर के शासन में यह किला संगीत, कला और अभेद्य सुरक्षा का चरम केंद्र बना। उन्होंने अपनी गुर्जरी रानी मृगनयनी के लिए किले की तलहटी में 'गुजरी महल' बनवाया जो आज दुर्लभ मूर्तियों का संग्रहालय है।
मान मंदिर महल भारतीय स्थापत्य में रंगीन इनेमल टाइल्स (Chini-work) के प्रयोग का दुर्लभतम जीवित उदाहरण है। महल की 300 फीट ऊंची बाहरी दीवार पर नीले, पीले और हरे रंगों में हाथियों, मयूरों और बतखों की पंक्तियां 500 वर्षों बाद भी चमकती हैं। महल के भीतर दो भूमिगत मंजिलों में हवादार झरोखों वाले संगीत कक्ष हैं जहां कभी तानसेन और बैजू बावरा ने संगीत साधना की थी। बाद में मुगलों ने इन तहखानों को शाही कारागार में बदल दिया जहां औरंगजेब ने अपने भाई मुराद बख्श को बंदी बनाकर रखा था।
सिंधिया राजवंश का जय विलास पैलेस ऐश्वर्य का अप्रतिम प्रतीक है। इसके दरबार हॉल की छत इतनी सुदृढ़ बनाई गई थी कि 3,500 किलो वजन वाले दो विशाल क्रिस्टल झूमरों को टांगने से पहले इंजीनियरों ने 10 हाथियों को छत पर चढ़ाकर उसकी मजबूती की परीक्षा ली थी। महल के डाइनिंग हॉल में ठोस चांदी की एक खिलौना रेलगाड़ी है जो डाइनिंग टेबल पर बिछी पटरियों पर घूमती हुई मेहमानों तक सिगार, वाइन और सूखे मेवे पहुंचाती थी।
ग्वालियर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का उद्गम स्थल माना जाता है जहां तानसेन, बैजू बावरा और ग्वालियर घराने के उस्तादों ने ख्याल गायकी को जन्म दिया। शहर के पुराने बाजारों (बाड़ा) में टहलते हुए शुद्ध देशी घी में तली बेढ़ई पूरी और तीखी आलू की सब्जी, बहादुरा के बूंदी के लड्डू, और एसबीआई चौराहे का पोहा-जलेबी ग्वालियर के पारंपरिक स्वाद की पहचान हैं।
किले तक पहुंचने के दो रास्ते हैं: पहला, ग्वालियर गेट (उरवाई गेट) जहां से गाड़ियां सीधे ऊपर तक जा सकती हैं; दूसरा, आलमगीर गेट जहां से पैदल सीढ़ियों द्वारा प्राचीन मूर्तियों को देखते हुए चढ़ा जाता है।
मान मंदिर महल के खुले प्रांगण में प्रतिदिन शाम को लाइट एंड साउंड शो होता है (अमिताभ बच्चन की आवाज में हिंदी शो और उसके बाद अंग्रेजी शो)।
जय विलास पैलेस संग्रहालय बुधवार को बंद रहता है। बाकी दिन सुबह 10:00 बजे से शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है।
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