कंदरिया महादेव मंदिर
खजुराहो का सबसे विशाल और अलंकृत 31 मीटर ऊंचा शिव मंदिर, जिसकी बाहरी व भीतरी दीवारों पर 872 से अधिक जीवंत पाषाण मूर्तियां हैं।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में विंध्य पर्वतमाला के साए में 282 मीटर की ऊंचाई पर स्थित खजुराहो भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला का वह स्वर्णिम शिखर है जहां पाषाण पर जीवन, भक्ति, संगीत और प्रेम के समस्त आयाम सजीव हो उठे हैं। 950 से 1050 ई. के मध्य चंदेल राजपूत राजाओं द्वारा निर्मित कभी 85 विशाल मंदिरों में से आज 25 मंदिर समय के थपेड़ों को सहकर जीवित हैं। 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित यह स्थल 31 मीटर ऊंचे कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, चतुर्भुज मंदिर और पश्चिमी समूह की मूर्तियों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों का ऐसा गहरा समन्वय प्रस्तुत करता है जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता।
खजुराहो का सबसे विशाल और अलंकृत 31 मीटर ऊंचा शिव मंदिर, जिसकी बाहरी व भीतरी दीवारों पर 872 से अधिक जीवंत पाषाण मूर्तियां हैं।
954 ई. में राजा यशोवर्मन द्वारा निर्मित पंचायतन शैली का उत्कृष्ट मंदिर, जिसके आधार पर सेना, संगीतकारों और गृहस्थ जीवन की अद्भुत झांकियां हैं।
खजुराहो का प्राचीनतम (लगभग 885 ई.) ग्रेनाइट पत्थरों से बना मंदिर, जो एक खुले प्रांगण में 64 योगिनियों की साधना को समर्पित है।
पूर्वी समूह का सबसे बड़ा जैन देवालय, जिसकी दीवारों पर दर्पण देखती सुंदरी और पैरों से कांटा निकालती अप्सरा की मूर्तियां विश्वप्रसिद्ध हैं।
खजुराहो का नाम इसके प्रवेश द्वारों पर लगे सुनहरे खजूर के पेड़ों (खर्जूरवाहक) से पड़ा। 9वीं शताब्दी में प्रतिहारों के सामंत रहे चंदेल राजपूतों ने जब अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की, तो उन्होंने अपनी राजधानी महोबा रखी किंतु अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक राजधानी के रूप में खजुराहो को चुना। राजा हर्षदेव, यशोवर्मन और धंगदेव जैसे प्रतापी शासकों ने अपने 100 वर्षों के स्वर्णकाल में बलुआ पत्थर के इन चमत्कारी देवालयों का निर्माण कराया जो नागर शैली के 'पंचायतन' विन्यास पर आधारित हैं।
जनमानस में खजुराहो को लेकर यह भ्रांति रहती है कि इसके मंदिर केवल कामुक मूर्तियों (Mithuna sculptures) के लिए हैं। वास्तविकता यह है कि इन मंदिरों की संपूर्ण मूर्तिकला में केवल 10% मूर्तियां ही प्रणय लीला से संबंधित हैं, जबकि 90% मूर्तियां दैनिक जीवन, युद्ध, शिकार, नर्तकियों, संगीतकारों, आचार्यों, और देवी-देवताओं की हैं। भारतीय तंत्र दर्शन के अनुसार काम जीवन की सृष्टि का मूल है और जब साधक मंदिर की बाहरी दीवारों पर सांसारिक जीवन और काम के चक्र को साक्षी भाव से देख लेता है, तभी वह अंतर्मन से गर्भगृह के शांत अंधकार में ब्रह्म के दर्शन का अधिकारी बनता है।
कंदरिया महादेव मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से संपूर्ण भारत के हिंदू मंदिरों में सबसे संतुलित और भव्य माना जाता है। इसका शिखर 84 छोटे-छोटे उप-शिखरों (उरुशृंग) से मिलकर बना है जो दूर से देखने पर ठीक कैलाश पर्वत की बर्फीली चोटियों की श्रृंखला जैसा प्रतीत होता है। मंदिर के गर्भगृह में 4 फीट ऊंचा संगमरमरी शिवलिंग स्थापित है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय जब बलुआ पत्थर पर किरणें पड़ती हैं, तो मंदिर सोने की तरह चमकने लगता है।
प्रत्येक वर्ष फरवरी के अंतिम सप्ताह में पश्चिमी मंदिर समूह के प्रांगण में 'खजुराहो नृत्य महोत्सव' आयोजित होता है, जहां कंदरिया महादेव की रोशनी से नहाई पृष्ठभूमि में भारत के शीर्ष कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी और कुचिपुड़ी नर्तक अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। खजुराहो से मात्र 40 किमी दूर स्थित 'पन्ना राष्ट्रीय उद्यान' (केन नदी और बाघों का वास) और 20 किमी दूर 'रानेह जलप्रपात' (केन नदी की 100 फीट गहरी रंगीन क्रिस्टलीय ग्रेनाइट कैनियन) इस यात्रा को प्रकृति और संस्कृति का संपूर्ण संगम बना देते हैं।
पश्चिमी मंदिर समूह में प्रवेश हेतु ASI की टिकट लगती है जो प्रवेश द्वार पर QR कोड स्कैन करके अथवा asi.payumoney.com से ऑनलाइन ₹40 (भारतीय) में ली जा सकती है। पूर्वी और दक्षिणी समूह के मंदिर निःशुल्क हैं।
यह महोत्सव हर साल 20 से 26 फरवरी के मध्य आयोजित किया जाता है। इसमें प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क होता है और पूरे विश्व से कला प्रेमी यहां आते हैं।
रानेह फॉल्स खजुराहो से 21 किमी दूर केन घड़ियाल अभयारण्य में स्थित है। ऑटो या निजी टैक्सी द्वारा 40 मिनट में पहुंचा जा सकता है। मानसून के बाद (अक्टूबर-दिसंबर) इसका नजारा सबसे भव्य होता है।
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