श्री राम राजा मंदिर
रानी गणेश कुंवरि का महल जो मंदिर बना, जहां भगवान राम को राजा मानकर प्रतिदिन पुलिस के जवानों द्वारा सशस्त्र सलामी दी जाती है।
मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में पवित्र बेतवा नदी के सात धाराओं ('सतधारा') के संगम पर बसा ओरछा बुंदेलखंड का सबसे जादुई और शांत ऐतिहासिक नगर है। 1531 में बुंदेला राजपूत राजा रुद्र प्रताप सिंह द्वारा स्थापित 'ओरछा' का शाब्दिक अर्थ ही होता है 'गुप्त स्थान'। यह समूचे विश्व का एकमात्र ऐसा पावन धाम है जहां भगवान श्री राम की पूजा एक तपस्वी या भगवान के रूप में नहीं बल्कि एक संप्रभु 'राजा' के रूप में होती है और मध्य प्रदेश पुलिस प्रतिदिन उन्हें सशस्त्र 'गार्ड ऑफ ऑनर' (शाही सलामी) देती है। 1605 का स्थापत्य अजूबा जहांगीर महल, आकाश को छूता चतुर्भुज मंदिर और बेतवा के कंचना घाट पर बनी बुंदेला राजाओं की 14 छतरियां ओरछा को अमर बनाती हैं।
रानी गणेश कुंवरि का महल जो मंदिर बना, जहां भगवान राम को राजा मानकर प्रतिदिन पुलिस के जवानों द्वारा सशस्त्र सलामी दी जाती है।
1605 में राजा वीर सिंह देव द्वारा मुगल सम्राट जहांगीर के एक रात के स्वागत हेतु निर्मित 236 कमरों वाला अद्भुत बुंदेला-मुगल प्रासाद।
105 मीटर ऊंचे शिखरों वाला विशाल मंदिर जो दिखने में यूरोपियन कैथेड्रल जैसा लगता है, मूलतः रामलला की स्थापना हेतु बना था।
कंचना घाट पर बेतवा के शांत पानी में प्रतिबिंबित बुंदेला शासकों की 14 मेहराबदार बहुमंजिला छतरियां, सूर्यास्त का जादुई दृश्य।
16वीं सदी की शुरुआत में जब बुंदेलखंड मुस्लिम आक्रमणों से त्रस्त था, तब बुंदेला राजा रुद्र प्रताप सिंह ने घने जंगलों और बेतवा नदी की धाराओं से घिरी एक सुरक्षित जगह खोजी और 1531 में नई राजधानी की नींव रखी। ओरछा के शासकों, विशेषकर वीर सिंह देव (1605-1627) ने मुगल सम्राट जहांगीर से गहरी मित्रता के कारण बुंदेलखंड में अपार समृद्धि और स्थापत्य का विस्तार किया। उन्होंने न केवल ओरछा का जहांगीर महल बल्कि दतिया का 7-मंजिला सतखंडा महल और झांसी का किला भी बनवाया।
16वीं सदी में ओरछा की महारानी गणेश कुंवरि अयोध्या से बाल रूप में श्री राम को अपनी गोद में लेकर ओरछा पधारी थीं। रामलला ने तीन शर्तें रखी थीं: पहला, वे ओरछा के बाद कहीं और नहीं जाएंगे; दूसरा, वे ओरछा के राजा होंगे और कोई अन्य राजा यहां नहीं रहेगा; तीसरा, वे जिस पहली जगह बैठेंगे, वहीं उनका स्थायी धाम होगा। रानी ने उन्हें चतुर्भुज मंदिर बनने तक अपने महल के रसोईघर में बैठा दिया। मंदिर पूर्ण होने पर जब प्रतिमा उठाने की चेष्टा की गई, तो वह टस से मस न हुई। रानी का महल ही 'राम राजा मंदिर' बन गया। आज भी ओरछा में किसी भी वीआईपी या राजनेता को गार्ड ऑफ ऑनर नहीं मिलता, यह सम्मान केवल राजा राम को समर्पित है।
ओरछा का जहांगीर महल बुंदेला और मुगल शैलियों के सामंजस्य की सर्वोच्च मिसाल है। चौकोर प्रांगण के चारों ओर तीन मंजिलों में बने झरोखे, नक्काशीदार छज्जे, हाथियों के आकार के पाषाण कोष्ठक और नीली टाइल्स की पट्टियां इसे मंत्रमुग्ध कर देती हैं। पास ही खड़ा चतुर्भुज मंदिर अपने विशाल पाषाण स्तंभों और गगनचुंबी शिखरों के साथ खड़ा है। इस मंदिर की छत पर चढ़कर पूरे ओरछा, बेतवा नदी और आसपास के जंगलों का 360-डिग्री दृश्य दिखाई देता है।
शाम के समय बेतवा नदी के कंचना घाट पर बैठना एक आध्यात्मिक ध्यान जैसा अनुभव है। नदी के शांत जल में जब 14 शाही छतरियों के गुंबद और सूर्यास्त की लालिमा परावर्तित होती है, तो प्रवासी गिद्ध छतरियों के शिखरों पर विश्राम करते दिखते हैं। मानसून के बाद बेतवा नदी में ग्रेड-2 की सुगम रीवर राफ्टिंग का आनंद भी लिया जा सकता है। ओरछा के स्थानीय बाजारों में बुंदेली कढ़ी, बेर की चटनी और पारंपरिक धातु शिल्प के स्मृति चिन्ह उपलब्ध होते हैं।
प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे 'राजभोग आरती' और रात 8:00 बजे (सर्दियों में) अथवा 9:00 बजे (गर्मियों में) 'शयन आरती' के ठीक पहले मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा मंदिर के प्रांगण में राजा राम को सशस्त्र गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
झांसी रेलवे स्टेशन (वीरांगना लक्ष्मीबाई जंक्शन) से ओरछा मात्र 18 किमी दूर है। स्टेशन के बाहर से ऑटो (लगभग ₹300-400) या टैक्सी द्वारा 30 मिनट में ओरछा पहुंचा जा सकता है।
राजा महल और जहांगीर महल के लिए एक ही संयुक्त टिकट मिलता है जो उसी दिन बेतवा तट की छतरियों के लिए भी मान्य होता है।
किलों, महलों, गुफाओं और तीर्थों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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