श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एवं भस्म आरती
एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग, जहां प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में चिता-भस्म व कपिला गाय के कंडे की भस्म से महाकाल की आरती होती है।
पवित्र शिप्रा नदी के पावन तट पर मालवा के पठार में 491 मीटर की ऊंचाई पर बसी उज्जैन (प्राचीन अवंतिका नगरी) हिंदू धर्म के सात मोक्षदायिनी पुरियों (सप्तपुरियों) में से एक है। 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र 'दक्षिणमुखी' महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान देवाधिदेव महादेव यहां साक्षात 'कालों के काल' बनकर विराजते हैं। तड़के 4 बजे होने वाली विश्वप्रसिद्ध 'भस्म आरती', 900 मीटर लंबा नव-निर्मित 'श्री महाकाल लोक कॉरिडोर', सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों की गाथा, मदिरा भोग स्वीकार करने वाले चमत्कारी काल भैरव, 51 शक्तिपीठों में शामिल हरसिद्धि माता और प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाला 'सिंहस्थ महाकुंभ' उज्जैन को सनातन धर्म की धड़कती आध्यात्मिक धुरी बनाते हैं।
एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग, जहां प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में चिता-भस्म व कपिला गाय के कंडे की भस्म से महाकाल की आरती होती है।
रुद्रसागर झील के किनारे 900 मीटर में फैला भव्य कॉरिडोर, जिसमें शिव पुराण की गाथाओं को दर्शाते 108 पाषाण स्तंभ और 200 विशाल मूर्तियां हैं।
अघोर तंत्र साधना का प्राचीन केंद्र, जहां भगवान काल भैरव की प्रतिमा को श्रद्धालु मदिरा का भोग लगाते हैं जिसे प्रतिमा साक्षात ग्रहण करती है।
शिप्रा नदी का प्रमुख स्नान घाट, जहां सिंहस्थ कुंभ के शाही स्नान होते हैं और प्रतिदिन संध्या को सैकड़ों दीपकों से दीप-दान व आरती होती है।
हिंदू खगोल शास्त्र में उज्जैन को पृथ्वी की नाभि और समय गणना का शून्य देशांतर (प्राइम मेरिडियन) माना जाता था, जैसा स्थान आज ग्रीनविच का है। सूर्य सिद्धांत के अनुसार कर्क रेखा और उज्जैन का देशांतर जहां काटते हैं, वह स्थान महाकाल वन है। सवाई जयसिंह ने 1725 में यहां जंतर मंतर (वेधशाला) का निर्माण कराया। पौराणिक काल में राजा विक्रमादित्य ने यहां विक्रम संवत (57 ई.पू.) की शुरुआत की और अपने दरबार में कालिदास, वराहमिहिर और धन्वंतरि जैसे नौ रत्नों को संरक्षण दिया।
महाकालेश्वर मंदिर में तड़के 4:00 बजे होने वाली 'भस्म आरती' दुनिया की सबसे रहस्यमयी और आध्यात्मिक आरतियों में से एक है। भगवान शिव श्मशान के अधिपति हैं और भस्म इस नश्वर संसार का अंतिम सत्य है। यह आरती साधक को स्मरण कराती है कि एक दिन यह शरीर भस्म में विलीन हो जाएगा, अतः अहंकार त्यागकर शिव की शरण में जाना ही मुक्ति का मार्ग है। आरती के समय गर्भगृह में मंत्रोच्चार, डमरू की ध्वनि और शंखनाद से संपूर्ण वातावरण दिव्य ऊर्जा से भर उठता है।
11 अक्टूबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित 'श्री महाकाल लोक' भारत के सबसे भव्य धार्मिक कॉरिडोर में से एक है। 900 मीटर लंबे इस पथ पर चलते हुए रुद्रसागर झील के किनारे शिव विवाह, त्रिपुरासुर वध, समुद्र मंथन, सती प्रसंग और कार्तिकेय-गणेश की लीलाओं को दर्शाती लाल बलुआ पत्थर की विशाल प्रतिमाएं मंत्रमुग्ध कर देती हैं। रात्रि में जब इस कॉरिडोर की फसाड लाइटिंग जलती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात शिवलोक पृथ्वी पर उतर आया हो।
उज्जैन में 51 शक्तिपीठों में से एक 'माता हरसिद्धि' का मंदिर है जहां सती की कोहनी गिरी थी। यहां प्रांगण में 13वीं सदी के दो विशाल 50 फीट ऊंचे पाषाण दीपस्तंभ हैं जिन पर नवरात्रि में 1,008 दीपक एक साथ प्रज्वलित किए जाते हैं। मंगल ग्रह की जन्मभूमि माना जाने वाला 'मंगलनाथ मंदिर' भात पूजा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उज्जैन की यात्रा में टावर चौक का पोहा-जलेबी, दाल-बाफला (घी में डूबे कंडे पर पके बाफले), और फ्रूट कुल्फी का स्वाद कभी न भूलने वाला होता है।
भस्म आरती की बुकिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के आधिकारिक पोर्टल shrimahakaleshwar.com पर 3 महीने पहले खुलती है। इसके अलावा सीमित संख्या में ऑफलाइन तत्काल काउंटर से एक दिन पहले शाम को भी पास मिलते हैं।
श्री महाकाल लोक प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे से रात 11:00 बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क है।
महाकालेश्वर मंदिर के आसपास हरसिद्धि मार्ग, राम घाट और रेलवे स्टेशन के निकट कई अच्छे धर्मशालाएं, होटल और मध्य प्रदेश पर्यटन (MPSTDC) के रिसॉर्ट्स उपलब्ध हैं।
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