सनातन मान्यता के अनुसार, अविमुक्त क्षेत्र काशी में कोई भी प्राणी भूखा नहीं सोता। इस अलौकिक व्यवस्था की अधिष्ठात्री मां अन्नपूर्णा हैं, जिन्हें साक्षात जगज्जननी पार्वती का पोषण स्वरूप माना गया है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से सटा हुआ यह देवालय काशी के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अनिवार्य केंद्र है।
पौराणिक पृष्ठभूमि एवं आध्यात्मिक मान्यता
स्कंद पुराण के 'काशी खंड' के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के मध्य सृष्टि और प्रकृति के संदर्भ में संवाद हुआ। भगवान शिव ने कहा कि दृश्य जगत माया है और भोजन भी उसी माया का एक अंग है। इस पर माता पार्वती ने प्रकृति और पोषण के महत्व को सिद्ध करने हेतु समस्त संसार से भोजन और अन्न को अंतर्धान कर दिया। परिणामस्वरूप तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।
समस्त प्राणियों के कष्ट को देखकर करुणामयी माता पार्वती काशी में प्रकट हुईं और उन्होंने एक विशाल अन्न-सत्र स्थापित किया। स्वयं देवाधिदेव महादेव ने हाथ में खप्पर लेकर माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी ताकि सृष्टि का पालन हो सके। इसी पौराणिक लीला के स्मरण में काशी में मां अन्नपूर्णा की आराधना की जाती है और माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन के उपरांत मां अन्नपूर्णा के दर्शन के बिना काशी यात्रा अपूर्ण रहती है।
"अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"
ऐतिहासिक निर्माण एवं वास्तुकला
वर्तमान भव्य प्रस्तर मंदिर का निर्माण 1729 ईस्वी में मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा करवाया गया था। यह देवालय उत्तर भारतीय नागर शैली और 18वीं शताब्दी के मराठा स्थापत्य का उत्कृष्ट समन्वय है।
- गर्भगृह एवं शिखर: गर्भगृह के ऊपर स्थापित नक्काशीदार प्रस्तर शिखर नागर परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिस पर सूक्ष्म पच्चीकारी और देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।
- स्तंभयुक्त मंडप: मंदिर का मुख्य मंडप ठोस बलुआ पत्थर के नक्काशीदार खंभों पर टिका है, जो मराठा काल की दृढ़ता और अलंकरण को दर्शाता है।
- मूल विग्रह: गर्भगृह में मां अन्नपूर्णा की धातु निर्मित भव्य प्रतिमा विराजमान है, जिनके एक हाथ में अन्नपात्र और दूसरे में स्वर्ण-कलछी सुशोभित है।
अलौकिक स्वर्ण प्रतिमा एवं धनतेरस दर्शन
अन्नपूर्णा मंदिर के प्रथम तल पर मां अन्नपूर्णा की ठोस स्वर्ण से निर्मित प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। यह दिव्य विग्रह वर्ष भर सुरक्षित गर्भगृह में रहता है और केवल धनतेरस, नरक चतुर्दशी एवं अन्नकूट (दीपावली पर्व) के पावन अवसर पर 3 से 4 दिनों के लिए श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु नीचे लाया जाता है।
धनतेरस के दिन मंदिर प्रबंधन द्वारा श्रद्धालुओं को 'खील' (धान का लावा) और सिक्का प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। जनआस्था है कि इस सिक्के और खील को घर की तिजोरी या अन्न के भंडार में रखने से वर्ष भर सुख, समृद्धि और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।
दैनिक पूजा एवं आरती समय
- मंगला आरती: प्रातः 04:00 बजे से 04:30 बजे तक
- सामान्य दर्शन: प्रातः 04:30 से दोपहर 12:30 बजे तक
- राजभोग एवं विश्राम (पट बंद): दोपहर 12:30 से 01:30 बजे तक
- अपराह्न दर्शन: दोपहर 01:30 से सायंकाल 07:00 बजे तक
- संध्या आरती: सायंकाल 07:00 बजे से 07:45 बजे तक
- शयन आरती एवं पट बंदी: रात्रि 10:30 बजे
कैसे पहुंचें (मार्गदर्शिका)
अन्नपूर्णा मंदिर वाराणसी के हृदय स्थल गोदौलिया और दशाश्वमेध के मध्य स्थित है:
- रेल मार्ग से: वाराणसी जंक्शन (कैंट रेलवे स्टेशन) से मंदिर की दूरी लगभग 4.5 किमी है। स्टेशन से गोदौलिया चौक तक ऑटो-रिक्शा या ई-रिक्शा आसानी से उपलब्ध हैं। गोदौलिया से विश्वनाथ गली पैदल 5-7 मिनट का मार्ग है।
- हवाई मार्ग से: बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 25 किमी की दूरी पर है। वहां से टैक्सी के माध्यम से गोदौलिया पहुंचा जा सकता है।
- सड़क मार्ग से: प्रयागराज, लखनऊ, गोरखपुर और पटना से राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा वाराणसी सीधे जुड़ा हुआ है।
आसपास के प्रमुख दर्शनीय स्थल
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
मात्र 50 मीटर की दूरी पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख धाम और भव्य कॉरिडोर।
दशाश्वमेध घाट
विश्व प्रसिद्ध दैनिक सायंकालीन भव्य गंगा आरती का दिव्य स्थल (500 मीटर)।
काल भैरव मंदिर
काशी के कोतवाल कहे जाने वाले भगवान काल भैरव का प्राचीन मंदिर (1.5 किमी)।