बंगाल की खाड़ी के पावन तट पर स्थित पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) में विराजमान श्री जगन्नाथ मंदिर सनातन धर्म के चार धामों में से एक प्रमुख वैकुंठ धाम है। मान्यता है कि भगवान विष्णु बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारका में वस्त्र धारण करते हैं, पुरी में भोजन (महाप्रसाद) ग्रहण करते हैं और रामेश्वरम में विश्राम करते हैं।
पौराणिक उत्पत्ति: राजा इंद्रद्युम्न और दारुब्रह्म विग्रह
स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' के अनुसार, मालवा के सूर्यवंशी राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु ने स्वप्न में नीलमाधव के रूप में दर्शन दिए। बाद में समुद्र में तैरते हुए एक अलौकिक दिव्य नीम के लट्ठे (दारुब्रह्म) से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्तियां तराशना प्रारंभ किया।
शर्त थी कि 21 दिनों तक कक्ष का द्वार न खोला जाए। किंतु 14वें दिन महारानी गुंडिचा की अधीरता के कारण राजा ने द्वार खोल दिया। देवशिल्पी अंतर्धान हो गए और भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रह उसी अपूर्ण हस्त-पाद स्वरूप में प्रकट रहे। भगवान ने राजा को आश्वासन दिया कि वे कलयुग में इसी दिव्य स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे।
5 अलौकिक रहस्य जो आज भी विज्ञान को चुनौती देते हैं
- विपरीत दिशा में ध्वज: मंदिर के 214 फीट ऊंचे शिखर पर लगा पतितपावन ध्वज विज्ञान के नियमों के विरुद्ध सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
- शिखर पर नीलकंठ/सुदर्शन चक्र: 1 टन वजनी अष्टधातु का सुदर्शन चक्र पुरी नगर के किसी भी कोने से देखने पर हमेशा सम्मुख (अपनी ओर मुड़ा हुआ) ही दिखता है।
- गुंबद की परछाई का न बनना: वर्ष के किसी भी दिन और किसी भी समय सूर्य की किरणें चाहे जिस कोण पर हों, मुख्य मंदिर के विशाल गुंबद की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती।
- शून्य पक्षी क्षेत्र: मंदिर के ऊपर से कभी कोई पक्षी नहीं उड़ता और न ही कोई विमान इसके ऊपर से गुजरता है।
- सिंहद्वार का ध्वनि विलोप: जैसे ही श्रद्धालु मंदिर के मुख्य सिंहद्वार से भीतर पहला कदम रखते हैं, समुद्र की प्रचंड लहरों की गर्जना एकाएक शांत हो जाती है। बाहर निकलते ही पुनः वही आवाज आने लगती है।