द्वादश ज्योतिर्लिंगों में आदि ज्योतिर्लिंग

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर, गुजरात: प्रथम ज्योतिर्लिंग, बाणस्तंभ व दर्शन गाइड

मुख्य दर्शन विवरण एवं समय सारणी
कपाट खुलने का समय
प्रातः 6:00 से रात्रि 10:00 बजे तक (निरंतर)
दैनिक प्रमुख आरतियां
प्रातः 7:00 AM, मध्याह्न 12:00 PM, सांध्य 7:00 PM
लाइट एंड साउंड शो
रात्रि 8:00 से 9:00 बजे (समुद्र तट प्रांगण)
त्रिवेणी संगम
हिरण, कपिला और सरस्वती नदी का संगम (1.5 किमी)
निकटतम रेलवे स्टेशन
वेरावल जंक्शन (VRL - 6 किमी) / सोमनाथ स्टेशन (500m)
निकटतम हवाई अड्डा
दीव हवाई अड्डा (85 किमी) / राजकोट (200 किमी)

सौराष्ट्र के पावन प्रभास क्षेत्र में अरब सागर की गरजती लहरों के तट पर प्रतिष्ठित श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम 'आदि ज्योतिर्लिंग' के रूप में वंदनीय है। शिव महापुराण के अनुसार, इस स्थान पर भगवान शिव साक्षात ज्योति स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।

पौराणिक उत्पत्ति: चंद्रदेव का श्राप-मोचन

पौराणिक आख्यान के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 पुत्रियों (27 नक्षत्रों) का विवाह चंद्रदेव (सोम) के साथ किया था। चंद्रदेव केवल रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते थे। दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रदेव को क्षय रोग (तेजहीन होने) का श्राप दे दिया।

समस्त सृष्टि में शीतलता और औषधियों का ह्रास होने पर ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र में आए और उन्होंने त्रिवेणी संगम पर शिवलिंग की स्थापना कर कठोर महामृत्युंजय तपस्या की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रदेव को श्राप-मुक्त किया और वरदान दिया कि कृष्ण पक्ष में उनका तेज घटेगा और शुक्ल पक्ष में पुनः पूर्ण होकर बढ़ेगा। चंद्रदेव की प्रार्थना पर महादेव नित्य निवास हेतु यहीं प्रतिष्ठित हो गए, जिससे उनका नाम 'सोमनाथ' पड़ा।

"सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥"

रहस्यमयी बाणस्तंभ (Arrow Pillar) का भौगोलिक विस्मय

सोमनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर स्थित बाणस्तंभ प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान का अद्वितीय चमत्कार है।

पुनरुत्थान का अमर प्रतीक: 1951 का ऐतिहासिक नवनिर्माण

मध्यकाल में आक्रांताओं द्वारा सोमनाथ मंदिर को बार-बार खंडित किया गया, किंतु सनातन आस्था ने इसे हर बार राख से पुनः जीवित किया:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

सोमनाथ से मात्र 4 किमी दूर स्थित भालका तीर्थ वह पावन स्थल है जहां पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करते समय भगवान श्री कृष्ण के चरण में जरा नामक बहेलिए का तीर लगा था और उन्होंने अपनी नश्वर लीला समाप्त कर वैकुंठ प्रस्थान किया था।
नहीं, सुरक्षा कारणों से मुख्य मंदिर परिसर के अंदर मोबाइल फोन, कैमरा, स्मार्टवॉच और चमड़े की वस्तुएं ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। मंदिर के बाहर विशाल निशुल्क लॉकर काउंटर उपलब्ध हैं।