सौराष्ट्र के पावन प्रभास क्षेत्र में अरब सागर की गरजती लहरों के तट पर प्रतिष्ठित श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम 'आदि ज्योतिर्लिंग' के रूप में वंदनीय है। शिव महापुराण के अनुसार, इस स्थान पर भगवान शिव साक्षात ज्योति स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।
पौराणिक उत्पत्ति: चंद्रदेव का श्राप-मोचन
पौराणिक आख्यान के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 पुत्रियों (27 नक्षत्रों) का विवाह चंद्रदेव (सोम) के साथ किया था। चंद्रदेव केवल रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते थे। दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रदेव को क्षय रोग (तेजहीन होने) का श्राप दे दिया।
समस्त सृष्टि में शीतलता और औषधियों का ह्रास होने पर ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र में आए और उन्होंने त्रिवेणी संगम पर शिवलिंग की स्थापना कर कठोर महामृत्युंजय तपस्या की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रदेव को श्राप-मुक्त किया और वरदान दिया कि कृष्ण पक्ष में उनका तेज घटेगा और शुक्ल पक्ष में पुनः पूर्ण होकर बढ़ेगा। चंद्रदेव की प्रार्थना पर महादेव नित्य निवास हेतु यहीं प्रतिष्ठित हो गए, जिससे उनका नाम 'सोमनाथ' पड़ा।
"सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥"
रहस्यमयी बाणस्तंभ (Arrow Pillar) का भौगोलिक विस्मय
सोमनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर स्थित बाणस्तंभ प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान का अद्वितीय चमत्कार है।
- इस स्तंभ के शीर्ष पर लगे तीर की नोक सीधे दक्षिण दिशा की ओर इंगित करती है।
- स्तंभ पर संस्कृत में उत्कीर्ण है: 'आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग'।
- अर्थात सोमनाथ मंदिर से लेकर सीधे पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) तक के लगभग 10,000 किलोमीटर के समुद्री मार्ग में कोई भी भू-भाग, द्वीप या पर्वत नहीं आता। बिना आधुनिक उपग्रहों के प्राचीन ऋषियों द्वारा इस अक्षांशीय सीधी रेखा का सटीक ज्ञान आज के वैज्ञानिकों को भी आश्चर्यचकित करता है।
पुनरुत्थान का अमर प्रतीक: 1951 का ऐतिहासिक नवनिर्माण
मध्यकाल में आक्रांताओं द्वारा सोमनाथ मंदिर को बार-बार खंडित किया गया, किंतु सनातन आस्था ने इसे हर बार राख से पुनः जीवित किया:
- सरदार पटेल का संकल्प: स्वतंत्रता के तुरंत बाद 13 नवंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रभास पाटन के समुद्र का जल हाथ में लेकर मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
- प्राण-प्रतिष्ठा (1951): भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई 1951 को ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करते हुए कहा था—"सोमनाथ का यह भव्य मंदिर इस बात का प्रतीक है कि निर्माण की शक्ति विनाश की शक्ति से कहीं अधिक महान और अमर है।"