नीलगिरि माउंटेन हेरिटेज टॉय ट्रेन
मेट्टुपलायम से ऊटी तक 46 किमी में 16 सुरंगों, 250 पुलों और खड़ी चढ़ाई पर रैक-एंड-पिनियन तकनीक से चलने वाली 1908 की यूनेस्को भाप ट्रेन।
तमिलनाडु के पश्चिमी छोर पर नीलगिरि पर्वतमाला के आंचल में 2,240 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ऊटी (आधिकारिक नाम 'उदगमंडलम') समूचे दक्षिण भारत में 'पहाड़ों की रानी' (Queen of Hill Stations) के रूप में विख्यात है। 1819 में कोयंबटूर के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर जॉन सुलिवन द्वारा खोजी गई यह ठंडी घाटी नीलगिरि (नीले पर्वत) की धुंध, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) के वनों, और रोलिंग चाय बागानों से आच्छादित है। 1908 में शुरू हुई यूनेस्को विश्व धरोहर 'नीलगिरि माउंटेन रेलवे' (एशिया की एकमात्र रैक-एंड-पिनियन भाप टॉय ट्रेन), दक्षिण भारत की दूसरी सर्वोच्च चोटी 2,637 मीटर ऊंची 'डोड्डाबेट्टा', 1848 का विशाल सरकारी बॉटनिकल गार्डन और मूल निवासी टोडा जनजाति की संस्कृतियां ऊटी को भारत का सबसे पसंदीदा समर रिसॉर्ट बनाती हैं।
मेट्टुपलायम से ऊटी तक 46 किमी में 16 सुरंगों, 250 पुलों और खड़ी चढ़ाई पर रैक-एंड-पिनियन तकनीक से चलने वाली 1908 की यूनेस्को भाप ट्रेन।
ऊटी से 9 किमी दूर नीलगिरि का सर्वोच्च शिखर, जहां टेलीस्कोप हाउस से दूर तक फैली नीली पहाड़ियों और कोयंबटूर के मैदानों का दृश्य दिखता है।
55 एकड़ में फैला 1848 का ब्रिटिश कालीन उद्यान जिसमें 20 मिलियन वर्ष पुराना जीवाश्म वृक्ष और रोज़ गार्डन में 20,000 से अधिक गुलाब की किस्में हैं।
1824 में जॉन सुलिवन द्वारा बनाई गई 65 एकड़ की कृत्रिम झील, जहां यूकेलिप्टस के पेड़ों के बीच नौकायन और टॉय ट्रेन का आनंद मिलता है।
1819 से पहले नीलगिरि की यह रहस्यमयी घाटी केवल स्थानीय पशुपालक जनजाति 'टोडा' और 'बड़ागा' के लोगों की भूमि थी। कोयंबटूर के कलेक्टर जॉन सुलिवन जब पहाड़ियों पर चढ़े, तो उन्होंने देखा कि यहां का मौसम बिल्कुल इंग्लैंड और स्विट्जरलैंड जैसा ठंडा है। 1822 में उन्होंने यहां अपना पहला पत्थर का बंगला 'स्टोन हाउस' बनाया (जो आज गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज का हिस्सा है)। 1870 के दशक में ब्रिटिश सरकार ने ऊटी को मद्रास प्रेसीडेंसी की आधिकारिक ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया, जिसके बाद यहां क्लब, गोल्फ कोर्स, चर्च और चाय बागान विकसित हुए।
नीलगिरि माउंटेन रेलवे (NMR) भारत की सबसे अनूठी और खड़ी चढ़ाई वाली रेलवे लाइन है। मेट्टुपलायम से कुन्नूर के बीच ढलान 1:12.5 जितनी तीखी है, जिसे सामान्य ट्रेन नहीं चढ़ सकती। इसके लिए स्विट्जरलैंड की 'अब्ट रैक-एंड-पिनियन' (Abt rack and pinion) प्रणाली का प्रयोग किया गया है, जिसमें पटरियों के बीच में एक दांतों वाली तीसरी रेल होती है जिस पर लोकोमोटिव का पहिया खांचे में फंसकर गाड़ी को बिना फिसले ऊपर खींचता है। यह एशिया की एकमात्र रैक रेलवे है जिसे 2005 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया।
ऊटी के मूल निवासी 'टोडा' (Toda) भारत की सबसे अनूठी जनजातियों में से एक हैं। उनकी पारंपरिक झोपड़ियां (Dogles) अर्ध-गोलाकार बैरल के आकार की होती हैं जिनमें बहुत छोटा प्रवेश द्वार होता है जिसके अंदर रेंगकर जाना पड़ता है। टोडा लोग शाकाहारी होते हैं और वे 'पवित्र जल भैंसों' की पूजा करते हैं। उनकी महिलाओं द्वारा हाथ से बुनी जाने वाली लाल और काले धागों की ज्यामितीय कढ़ाई वाली शॉल 'पुथुकुली' (Toda Embroidery) को भारत सरकार द्वारा जीआई टैग प्राप्त है।
ऊटी की हवाओं में नीलगिरि यूकेलिप्टस तेल और चाय पत्तियों की ताजी खुशबू रची-बसी है। ऊटी भारत में 'होममेड चॉकलेट्स' (Homemade Chocolates) का सबसे बड़ा केंद्र है जहां डार्क, हेज़लनट, फज और ट्रफल चॉकलेट्स हर दुकान पर मिलती हैं। पास ही 19 किमी दूर स्थित शांत शहर 'कुन्नूर' (Coonoor) में सिम्स पार्क, डॉल्फिन नोज़ और विशाल चाय फैक्ट्रियां हैं। ऊटी के बाजार से शुद्ध नीलगिरि चाय पत्ती, यूकेलिप्टस तेल और घर की बनी चॉकलेट खरीदे बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है।
टॉय ट्रेन की बुकिंग IRCTC (ट्रेन संख्या 56136 मेट्टुपलायम से उदगमंडलम) पर 120 दिन पहले खुलती है। चूंकि ट्रेन में डिब्बों की संख्या सीमित होती है, इसलिए 2-3 महीने पहले ही आरक्षण करा लेना चाहिए।
कोयंबटूर हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन से ऊटी की दूरी 88 किमी है। मेट्टुपलायम और कुन्नूर होते हुए सुंदर पहाड़ी घुमावदार रास्तों से टैक्सी द्वारा 3 से 3.5 घंटे में ऊटी पहुंचा जा सकता है।
सरकारी बॉटनिकल गार्डन में हर साल मई के तीसरे सप्ताहांत में 3 से 5 दिनों का भव्य ग्रीष्मकालीन पुष्प मेला आयोजित होता है जिसमें 1.5 लाख से अधिक रंग-बिरंगे फूल प्रदर्शित किए जाते हैं।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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