वृहदेश्वर महामंदिर (पेरिया कोविल)
1,30,000 टन ग्रेनाइट से निर्मित 1,000 वर्ष पुराना मंदिर, जिसकी दीवारों पर तमिल और संस्कृत के मूल चोल शिलालेख खुदे हैं।
कावेरी नदी के उपजाऊ डेल्टा में बसा तंजावूर (तंजौर) 9वीं से 13वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया पर शासन करने वाले महान चोल साम्राज्य की वैभवशाली राजधानी रहा है। 1010 ई. में चक्रवर्ती सम्राट राजराज चोल प्रथम द्वारा पूर्ण कराया गया 'वृहदेश्वर मंदिर' (स्थानीय नाम 'पेरिया कोविल' अर्थात बड़ा मंदिर) भारतीय पाषाण स्थापत्य का सर्वोच्च चमत्कार है। 1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित यह मंदिर पूरी तरह ठोस ग्रेनाइट पत्थरों से बना है, जिसका 66 मीटर ऊंचा 16 मंजिला 'विमान' भारत का सबसे ऊंचा मंदिर शिखर है और इसके शीर्ष पर 80 टन वजन का एक ही पाषाण खंड (कुंभम) बिना किसी जोड़ के स्थापित है। इसके अतिरिक्त तंजावूर मराठा पैलेस, 400 वर्ष पुरानी सरस्वती महल लाइब्रेरी और 22 कैरेट सोने के वर्क वाली तंजौर चित्रकला इसे विश्व भर में अमर बनाते हैं।
1,30,000 टन ग्रेनाइट से निर्मित 1,000 वर्ष पुराना मंदिर, जिसकी दीवारों पर तमिल और संस्कृत के मूल चोल शिलालेख खुदे हैं।
एक ही विशालकाय पत्थर से तराशी गई 13 फीट ऊंची और 16 फीट लंबी नंदी बैल की प्रतिमा, जो मंदिर के प्रवेश पर बैठी है।
नायक और मराठा राजाओं का 16वीं सदी का महल, जिसमें चोल काल की कांस्य नटराज मूर्तियों का विश्वप्रसिद्ध संग्रह स्थित है।
एशिया के प्राचीनतम पुस्तकालयों में से एक, जहां ताड़पत्रों पर लिखी 60,000 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां और मानचित्र सुरक्षित हैं।
वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण मानव इतिहास का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग विस्मय माना जाता है। तंजावूर के आसपास 60 किमी के दायरे में कोई पहाड़ या चट्टान नहीं है; चोल इंजीनियरों ने 1,30,000 टन कठोर ग्रेनाइट हाथियों और नावों की सहायता से दूर की पहाड़ियों से यहां पहुंचाया। मंदिर का शिखर (विमान) पिरामिडनुमा 16 मंजिलों में ऊपर उठता है। इसके शीर्ष पर 80 टन (80,000 किलो) के विशाल गोल पत्थर को चढ़ाने के लिए 6 किमी लंबा मिट्टी का एक विशाल ढलान (Ramp) बनाया गया था, जिस पर हाथियों और रस्सों की सहायता से इसे ऊपर खींचा गया था।
एक लोकप्रिय जनश्रुति है कि दोपहर के समय मंदिर के शिखर की छाया जमीन पर नहीं पड़ती। वैज्ञानिक रूप से यह छाया मंदिर के विशाल आधार के चबूतरे पर ही सिमट जाती है, जिससे यह भ्रम होता है कि छाया नहीं पड़ रही। मंदिर के विशाल गर्भगृह में 29 फीट ऊंचे चबूतरे पर 12 फीट ऊंचा एक ही पाषाण खंड से बना विशाल शिवलिंग स्थापित है जिसे 'महामलिंगम' कहा जाता है। गर्भगृह के चारों ओर की प्रदक्षिणा दीवार पर चोल काल के मूल रंगीन भित्ति चित्र (Murals) बने हैं जिनमें राजराज चोल और उनके गुरु करूर देवर के दुर्लभ चित्र हैं।
तंजावूर की भूमि कला की त्रिवेणी है। चोल काल में 'खोया मोम' (Lost-wax process) तकनीक से ढाली गई कांस्य मूर्तियां—विशेषकर भगवान शिव की 'नटराज' मुद्रा—विश्व भर के कला संग्रहालयों में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अतिरिक्त 16वीं सदी से चली आ रही 'तंजौर पेंटिंग' (Tanjore Painting) लकड़ी के बोर्ड पर सोने के 22 कैरेट वर्क, अर्ध-मूल्यवान पत्थरों और जयपुर ग्लास से बनाई जाती है, जिसमें बाल कृष्ण और देवी-देवताओं के गोल मुखड़े और चमकीले आभूषण सजीव लगते हैं।
तंजावूर को कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति (त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री) का पोषण स्थल माना जाता है। यहां कटहल की लकड़ी से हाथ से तराशी जाने वाली 'तंजावूर वीणा' को जीआई टैग प्राप्त है। कावेरी डेल्टा का सुगंधित सेरागा साम्बा चावल और पारंपरिक तमिल ब्राह्मण भोजन में सांबर, रसम और अप्पलम का स्वाद अत्यंत प्रसिद्ध है।
वृहदेश्वर मंदिर प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और शाम 4:00 बजे से रात 8:30 बजे तक खुला रहता है। शाम के समय जब मंदिर पर रोशनी की जाती है, तो इसका दृश्य सबसे विस्मयकारी होता है।
तंजावूर जंक्शन रेलवे स्टेशन सभी प्रमुख दक्षिण भारतीय शहरों से जुड़ा है। निकटतम हवाई अड्डा तिरुचिरापल्ली (TRZ - त्रिची) है जो मात्र 55 किमी दूर है जहां से टैक्सी द्वारा 1 घंटे में पहुंचा जा सकता है।
नहीं, वृहदेश्वर मंदिर में प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क है। केवल मंदिर परिसर में स्थित ASI संग्रहालय में ₹5 का सांकेतिक टिकट लगता है।
मंदिरों, बैकवाटर्स, समुद्र तटों और हिल स्टेशनों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
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