हर की पौड़ी एवं ब्रह्मकुंड
गंगा का सर्वोच्च पावन स्नान घाट, जहां पाषाण पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न (श्री हरि के चरण) पूजे जाते हैं।
हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों को चीरकर जब मोक्षदायिनी पतितपावनी मां गंगा मैदानी भागों में प्रथम पदार्पण करती हैं, तो उस पावन भूमि को 'हरिद्वार' (हरि और हर का द्वार) कहा जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में 'मायापुरी' नाम से प्रसिद्ध यह तीर्थ भारत की सात पवित्रतम मोक्षदायिनी पुरियों (सप्तपुरियों) में से एक है। राजा विक्रमादित्य के भ्राता राजा भर्तृहरि की तपोस्थली 'हर की पौड़ी' का अमृत ब्रह्मकुंड, संध्या के समय सहस्रों दीपकों और शंखनाद से गुंजायमान विश्वप्रसिद्ध 'गंगा महाआरती', बिलवा पर्वत पर मनसा देवी और नील पर्वत पर चंडी देवी के सिद्ध पीठ, और प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाला 'महाकुंभ महापर्व' हरिद्वार को सनातन धर्म की अमर धुरी बनाते हैं।
गंगा का सर्वोच्च पावन स्नान घाट, जहां पाषाण पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न (श्री हरि के चरण) पूजे जाते हैं।
प्रतिदिन सूर्यास्त के समय 51 दीपकों के विशाल पीतल के स्टैंडों से होने वाली अलौकिक आरती, जब गंगाजल में तैरते दीये तारों जैसे दिखते हैं।
गंगा के दोनों किनारों पर आमने-सामने खड़ी पहाड़ियों पर स्थित दो सिद्ध शक्तिपीठ, जहां रज्जुमार्ग (Ropeway) से पहुंचा जाता है।
भगवान शिव के ससुर राजा दक्ष की यज्ञभूमि, जहां माता सती ने देहत्याग किया था; यहां का प्राचीन शिवलिंग और यज्ञ कुंड अत्यंत जाग्रत हैं।
स्कंद पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को लेकर जब देव और दानवों में संघर्ष हुआ, तो गरुड़ जी अमृत कलश लेकर उड़े। उस समय पृथ्वी पर चार स्थानों—हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक—में अमृत की पवित्र बूंदें गिरीं। हरिद्वार में जहां अमृत गिरा, वही स्थान हर की पौड़ी का 'ब्रह्मकुंड' कहलाया। यहीं स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। राजा विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में अपने वैरागी भाई भर्तृहरि की स्मृति में यहां पहले पक्के घाट का निर्माण कराया था।
हरिद्वार का सबसे जादुई क्षण वह होता है जब शाम को गंगा सभा के अर्चक पारंपरिक वस्त्रों में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गंगा स्तुति का गान करते हैं। जैसे ही विशाल पीतल के 51 दीपकों में अग्नि प्रज्वलित होती है और हर-हर गंगे के जयघोष से समूची घाटी गूंजती है, श्रद्धालु पत्तों के दोने में गेंदे के फूल और जलते दीये गंगा की तेज धारा में प्रवाहित करते हैं। कुछ ही पलों में गंगा का जल हजारों तैरते दीपकों से स्वर्णिम आभा में दमकने लगता है।
हरिद्वार से 3 किमी दक्षिण में स्थित कनखल महाभारत कालीन ऐतिहासिक स्थल है। यहां दक्षेश्वर महादेव मंदिर स्थित है जहां राजा दक्ष ने वह विशाल महायज्ञ आयोजित किया था जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित न किए जाने पर माता सती ने यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद क्रोधित शिवजी के गण वीरभद्र ने दक्ष का शीश काट दिया था और बाद में भगवान शिव ने उन्हें बकरे का सिर लगाकर जीवनदान दिया। श्रावण मास में यहां लाखों कांवड़िए गंगाजल लेने पहुंचते हैं।
हरिद्वार भारत में आयुर्वेद, योग और वैदिक साधना का शीर्ष केंद्र है। शांतिकुंज और पतंजलि योगपीठ में विश्व भर से साधक आते हैं। हरिद्वार के 'बड़ा बाजार' और 'मोती बाजार' में टहलते हुए शुद्ध देशी घी में तली कचौरी और आलू की सब्जी, मोहन जी की मलाईदार रबड़ी और जलेबी, और कुल्हड़ वाला गाढ़ा बादामी दूध हर तीर्थयात्री की थकान मिटा देता है। बाजार से गंगाजली (गंगाजल भरने के तांबे/पीतल के पात्र), रुद्राक्ष और आयुर्वेदिक औषधियां खरीदना पारंपरिक है।
गंगा आरती सूर्योदय और सूर्यास्त के समय होती है। शाम की महाआरती गर्मियों में लगभग 6:30 से 7:00 बजे और सर्दियों में शाम 5:30 से 6:00 बजे के बीच होती है। अच्छी जगह बैठने के लिए आरती से 45 मिनट पहले पहुंचना चाहिए।
दोनों मंदिरों के लिए संयुक्त रोपवे टिकट (Combo Ropeway Ticket) स्टेशन के काउंटर से लगभग ₹300-350 में उपलब्ध होती है, जिसमें दोनों पहाड़ियों की आना-जाना यात्रा शामिल होती है।
दिल्ली से हरिद्वार की दूरी 215 किमी है। वंदे भारत और जनशताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन से मात्र 3.5 घंटे में पहुंचा जा सकता है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के रास्ते सड़क मार्ग से भी 4 घंटे का समय लगता है।
मंदिरों, घाटों, किलों और ऐतिहासिक नगरों की विस्तृत जानकारी के लिए राज्य पोर्टल पर जाएं।
सम्पूर्ण उत्तराखंड एक्सप्लोर करें →