श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर (तिरुमला), तिरुपति
कलियुग वैकुंठ, विश्व का सर्वाधिक दर्शनार्थियों वाला तीर्थ, आनंद निलयम स्वर्ण गोपुरम, विश्वप्रसिद्ध तिरुपति लड्डू (GI टैग) और नौ दिवसीय ब्रह्मोत्सवम।
सप्तगिरि पहाड़ियों पर विराजमान कलियुग के प्रत्यक्ष देव भगवान वेंकटेश्वर (तिरुमलाई तिरुपति), द्वादश ज्योतिर्लिंगों में मल्लिकार्जुन श्रीशैलम, भारत का ग्रैंड कैनियन गंडिकोटा, लेपाक्षी का झूलता हुआ खंभा और अराकू घाटी की कॉफी पहाड़ियों से दैदीप्यमान आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत का पावन आध्यात्मिक प्रवेश द्वार है।
कलियुग वैकुंठ, विश्व का सर्वाधिक दर्शनार्थियों वाला तीर्थ, आनंद निलयम स्वर्ण गोपुरम, विश्वप्रसिद्ध तिरुपति लड्डू (GI टैग) और नौ दिवसीय ब्रह्मोत्सवम।
पेन्नार नदी द्वारा 300 फीट गहरी लाल बलुआ पत्थर की खड़ी चट्टानों को चीरकर बनाया गया विस्मयकारी कैनियन, 13वीं सदी का किला, जमा मस्जिद एवं माधवराय मंदिर।
नल्लामलाई पहाड़ियों पर कृष्णा नदी (पाताल गंगा) तट पर स्थित दुर्लभ तीर्थ जहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठ (भ्रमराम्बा देवी) एक साथ हैं।
1530 ई. में विजयनगर काल में निर्मित मंदिर, फर्श से बिना छुए हवा में झूलता हुआ चमत्कारी स्तंभ, भारत की विशालतम नंदी एकाश्म प्रतिमा और नाग लिंग।
पूर्वी घाट की हरी-भरी घाटी, जैविक अराकू कॉफी बगान, कतकी जलप्रपात और 10 लाख वर्ष पुरानी चूना पत्थर की स्टैलेक्टाइट बोरा गुफाएं।
भारतीय उपमहाद्वीप की दूसरी सबसे लंबी प्राकृतिक चूना पत्थर गुफाएं (3.22 किमी), जहाँ भूमिगत जलप्रपात और बौद्ध भिक्षुओं की ध्यान स्थली 'पाताल गंगा' है।
आंध्र प्रदेश का इतिहास मौर्य साम्राज्य, सातवाहन (अमरावती राजधानी), इक्ष्वाकु, चालुक्य, काकतीय और महान विजयनगर साम्राज्य से आलोकित है। अमरावती प्राचीन काल में महायान बौद्ध दर्शन और आचार्य नागार्जुन का विश्व केंद्र था। 16वीं सदी में विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय ने तिरुपति और लेपाक्षी को स्वर्ण और स्थापत्य से अलंकृत किया। स्वतंत्रता सेनानी अल्लूरी सीताराम राजू ने रम्पा विद्रोह (1922-24) में अंग्रेजों के विरुद्ध जनजातीय स्वाधीनता का नेतृत्व किया। 1 अक्टूबर 1953 को भाषाई आधार पर गठित होने वाला आंध्र प्रदेश भारत का पहला राज्य था।
आंध्र प्रदेश 974 किमी लंबी पूर्वी तटरेखा से युक्त है जो गुजरात के बाद देश में दूसरी सबसे लंबी है। इसके दो प्रमुख भाग हैं: तटीय आंध्र और पश्चिमी पठारी रायलसीमा। गोदावरी और कृष्णा नदियां बंगाल की खाड़ी में मिलने से पूर्व विशाल उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं। विशाखापट्टनम के पास स्थित लम्बसिंगी (Lambasinghi) दक्षिण भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ सर्दियों में कभी-कभी तापमान शून्य डिग्री तक गिर जाता है। कडपा में पेन्नार नदी का गंडिकोटा गॉर्ज विस्मयकारी अमेरिकी ग्रैंड कैनियन की प्रतिकृति जैसा दिखता है।
कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य) सिद्धेंद्र योगी की नाट्य परंपरा का गौरव है। त्यागराज और अन्नमाचार्य की अमर भक्ति संगीत रचनाएं आज भी तिरुपति में गूंजती हैं। कलमकारी हस्तकला (मछलीपट्टनम व श्रीकालहस्ती), कोंडापल्ली के लकड़ी के खिलौने और धर्मावरम सिल्क साड़ियां जीआई टैग प्राप्त हैं। तिरुपति का विशेष 'लड्डू प्रसादम', गुंटूर की तीखी मिर्च, हैदराबादी-आंध्र भोजन, पुलीहोरा (इमली चावल), और गोन्गूरा पचड़ी (अम्बाडी पत्ता चटनी) यहाँ के विशिष्ट स्वाद हैं।
आंध्र प्रदेश भ्रमण के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे सुखद है। तिरुपति बालाजी के विशेष प्रवेश दर्शन (₹300 टिकट) हेतु तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) की आधिकारिक वेबसाइट (tirupatibalaji.ap.gov.in) पर 3 महीने पहले बुकिंग आवश्यक है। विशाखापट्टनम से अराकू घाटी के लिए विस्टाडोम ग्लास-रूफ ट्रेन कोच की सवारी पूर्वी घाट की सुरम्य वादियों का जादुई अनुभव कराती है।
लेपाक्षी के वीरभद्र मंदिर में 70 नक्काशीदार पाषाण स्तंभों में से एक मुख्य स्तंभ फर्श से लगभग आधा इंच ऊपर हवा में लटका हुआ है। इसके नीचे से कपड़ा या कागज आर-पार निकाला जा सकता है। ब्रिटिश इंजीनियरों ने इस रहस्य को जानने के लिए इसे हिलाने की कोशिश की थी, जिससे पूरे मंदिर के स्तंभ झुकने लगे थे और उन्होंने इसे छोड़ दिया।
कडपा जिले में पेन्नार नदी ने एरामाला पहाड़ियों की लाल बलुआ पत्थर की 300 फीट ऊंची खड़ी चट्टानों को लाखों वर्षों में काटकर एक गहरी और विशाल घाटी (Gorge) बनाई है। इसका विहंगम दृश्य संयुक्त राज्य अमेरिका के एरिज़ोना स्थित ग्रैंड कैनियन जैसा हूबहू प्रतीत होता है।
भगवान वेंकटेश्वर को भोग के रूप में अर्पित किया जाने वाला 'तिरुपति लड्डू' 1715 ई. से प्रारंभ हुआ। इसमें बेसन, शुद्ध देशी घी, काजू, किशमिश, इलायची और मिश्री (कल्कंड) का उपयोग किया जाता है। इसकी विशिष्ट प्रामाणिकता और स्वाद के कारण इसे भारत सरकार द्वारा बौद्धिक संपदा (GI टैग) का संरक्षण प्राप्त है।
तिरुपति के निकट स्थित श्रीकालहस्ती मंदिर पंचतत्व मंदिरों में 'वायु लिंग' का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ गर्भगृह में बिना किसी हवा के अखंड दीपक की लौ निरंतर हिलती रहती है। यहाँ राहु-केतु सर्पदोष निवारण पूजा पूरे भारत से श्रद्धालु कराने आते हैं।