चित्रकूट जलप्रपात ('भारत का नियाग्रा'), बस्तर
इंद्रावती नदी पर 95 फीट ऊंचा और 300 मीटर चौड़ा घोड़े की नाल के आकार का जलप्रपात, जो मानसून में गरजती जलराशि से मन मोह लेता है।
इंद्रावती और महानदी के पावन प्रवाह, बस्तर के 75 दिवसीय विश्वप्रसिद्ध दशहरे, छत्तीसगढ़ के खजुराहो कहलाने वाले भोरमदेव मंदिर और घने दंडकारण्य वनों से अलंकृत छत्तीसगढ़ अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति और शांति का परिचायक है।
इंद्रावती नदी पर 95 फीट ऊंचा और 300 मीटर चौड़ा घोड़े की नाल के आकार का जलप्रपात, जो मानसून में गरजती जलराशि से मन मोह लेता है।
11वीं सदी में फणी नागवंश द्वारा निर्मित नागर शैली का 'छत्तीसगढ़ का खजुराहो', कामकला और मूर्तिकला का अद्भुत पाषाण संगम।
52 शक्तिपीठों में एक जहाँ सती का दांत गिरा था, शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बस्तर की अधिष्ठात्री देवी।
महानदी तट पर 5वीं-8वीं सदी की प्राचीन राजधानी, ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार जहाँ ह्वेनसांग ने यात्रा की थी।
मुनगाबहार नदी पर 300 फीट से सीढ़ीदार चट्टानों पर गिरता दूधिया प्रपात और चूना पत्थर की स्टैलेक्टाइट व स्टैलेग्माइट वाली रहस्यमयी गुफाएं।
विंध्य पर्वतमाला पर स्थित सुरम्य पठार, जलजली (उछलती हुई जमीन), टाइगर पॉइंट और तिब्बती बौद्ध मठ व कालीन उद्योग।
छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में 'दक्षिण कोशल' कहा जाता था, जो भगवान श्रीराम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। वाकाटक, नल, शरभपुरीय, पांडुवंशी और कलचुरी राजवंशों (रतनपुर व रायपुर शाखा) ने यहाँ 1,000 वर्षों तक स्थिर शासन किया। मराठा काल के उपरांत 1857 में शहीद वीर नारायण सिंह ने सोनाखान से अंग्रेजों के विरुद्ध शहादत दी। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना।
छत्तीसगढ़ को महानदी और उसकी सहायक नदियां एक विस्तृत उपजाऊ मैदान प्रदान करती हैं जिसे 'धान का कटोरा' कहा जाता है। उत्तर में सरगुजा की पहाड़ियां (छोटा नागपुर से जुड़ी) और दक्षिण में दंडकारण्य (बस्तर का पठार) फैले हैं। इंद्रावती नदी पर बना चित्रकूट प्रपात मानसूनी प्रवाह में विश्व का सबसे चौड़ा प्राकृतिक जलप्रपात बन जाता है। कांगेर घाटी में अंधी मछलियों वाली कुटुमसर गुफाएं भूवैज्ञानिक अजूबा हैं।
बस्तर का 75 दिवसीय दशहरा विश्व का सबसे लंबा चलने वाला पर्व है, जिसमें रावण वध नहीं बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और रथ यात्रा होती है। पंथी नृत्य (सतनामी परंपरा), राउत नाचा (यादव लोकनृत्य) और पंडवानी (महाभारत गायन - तीजन बाई) यहाँ की अमर कलाएं हैं। ढोकरा बेल मेटल क्राफ्ट और कोसा सिल्क को वैश्विक पहचान मिली है। चीला, फरा, अंगाकर रोटी, बोरे बासी, और लाल चींटी की चटनी (चांपड़ा) यहाँ के पारंपरिक स्वाद हैं।
छत्तीसगढ़ भ्रमण के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे आदर्श है। बस्तर दशहरे (आश्विन मास) के दौरान जगदलपुर की यात्रा जनजातीय परंपराओं का साक्षात् दर्शन कराती है। रायपुर से जगदलपुर के बीच नेशनल हाईवे 30 उत्कृष्ट स्थिति में है और मार्ग में घने साल वनों का आनंद मिलता है।
इंद्रावती नदी पर स्थित चित्रकूट जलप्रपात का मुहाना घोड़े की नाल (Horseshoe) के आकार का है और मानसून में इसकी चौड़ाई 300 मीटर तक फैल जाती है। इसका विशाल फैलाव और गरजती जलराशि नियाग्रा प्रपात जैसी अनुभूति कराती है।
बस्तर दशहरा में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यह 75 दिनों तक चलने वाला जनजातीय उत्सव है जिसमें विभिन्न जनजातियां मिलकर 8 पहियों का विशाल काष्ठ रथ बनाती हैं और मां दंतेश्वरी की पूजा करती हैं।
कवर्धा के भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में फणी नागवंश के राजा गोपाल देव ने कराया था। यह नागर शैली का सप्तरथ मंदिर है जिसकी बाहरी दीवारों पर कामसूत्र और पौराणिक कथाओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं।
सिरपुर 6वीं-7वीं सदी में दक्षिण कोशल की राजधानी था। यहाँ ईंटों से निर्मित 7वीं सदी का लक्ष्मण मंदिर भारत के प्राचीनतम पकी ईंटों के मंदिरों में से एक है। 7वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहाँ 100 बौद्ध विहारों का उल्लेख किया था।