बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, देवघर
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में 'कामना लिंग', 51 शक्तिपीठों में हृदयपीठ, विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेला जहाँ लाखों कांवड़िये 105 किमी पैदल गंगाजल लाते हैं।
छोटानागपुर के साल वनों, सुवर्णरेखा नदी के दुधिया प्रपातों, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पावन कामना लिंग बाबा बैद्यनाथ और 20 जैन तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली सम्मेद शिखरजी से अलंकृत झारखंड प्राकृतिक व आध्यात्मिक संपदा का धनी राज्य है।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में 'कामना लिंग', 51 शक्तिपीठों में हृदयपीठ, विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेला जहाँ लाखों कांवड़िये 105 किमी पैदल गंगाजल लाते हैं।
सुवर्णरेखा नदी पर 98 मीटर ऊंचा हुंडरू प्रपात और कांची नदी की 10 धाराओं में गिरता मनोहारी दसम प्रपात।
जैन धर्म का सर्वोच्च तीर्थ जहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया, 27 किमी की पवित्र पैदल परिक्रमा।
पलामू टाइगर रिज़र्व का कोर क्षेत्र, 1932 में विश्व की पहली बाघ गणना स्थली, चेरो राजाओं का प्राचीन पलामू किला और हाथी सफारी।
3,700 फीट की ऊंचाई पर बसा मनोहारी हिल स्टेशन, मैगनोलिया पॉइंट से सूर्यास्त, घाघरी प्रपात और चीड़ के सुरम्य वन।
17वीं-19वीं सदी के ननकर राजाओं द्वारा निर्मित 72 जीवित टेराकोटा मंदिर, जिसे 'मंदिरों का गांव' कहा जाता है, मां मौलिक्षा मंदिर।
झारखंड का इतिहास मुंडा, संताल, उरांव, हो और खड़िया जनजातियों की अदम्य स्वाधीनता भावना से आलोकित है। चेरो और नागवंशी राजवंशों ने छोटानागपुर पर सदियों तक शासन किया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1855 का संताल हूल (सिदो-कान्हू) और 1899 का 'उलगुलान' (धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा) भारतीय स्वतंत्रता चेतना के मील के पत्थर हैं। 15 नवंबर 2000 को बिरसा मुंडा की जयंती पर झारखंड अलग राज्य बना।
झारखंड मुख्यतः छोटानागपुर पठार पर स्थित है जो खनिज संपदा (कोयला, लौह अयस्क, तांबा, अभ्रक) की दृष्टि से भारत का 'रूर' कहलाता है। राज्य का 29% से अधिक भूभाग सघन वनों से आच्छादित है। सारंडा का वन 700 पहाड़ियों पर फैला एशिया का विशालतम साल वन है। लातेहार का लोध (बूढ़ा घाघ) प्रपात 143 मीटर ऊंचाई के साथ राज्य का सर्वोच्च जलप्रपात है।
सरहुल (साल वृक्ष के फूलों का पूजन), करम पर्व और सोहराई झारखंड के प्रमुख लोक उत्सव हैं। सोहराई और कोहबर भित्ति चित्रकला को जीआई टैग प्राप्त है, जिसमें मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से पशु-पक्षियों के सुंदर चित्र उकेरे जाते हैं। छऊ नृत्य (सरायकेला शैली) यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर है। धुस्का-चना, मारुआ रोटी, रुगड़ा (जंगली मशरूम), पीठा और बांस के कोपल (करील) यहाँ के पौष्टिक पारंपरिक व्यंजन हैं।
झारखंड भ्रमण के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे सुहावना रहता है। सावन मास में देवघर का कांवड़ मेला धार्मिक दृष्टि से अविस्मरणीय अनुभव है। पतरातु घाटी की सर्पीली सड़कें और नेतरहाट का सूर्यास्त सड़क यात्रा प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान हैं।
श्रावण मास में आयोजित होने वाला देवघर मेला विश्व का सबसे लंबा अनवरत चलने वाला धार्मिक मेला है, जिसमें श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगाजल लेकर 105 किमी नंगे पांव चलकर बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करते हैं।
गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पहाड़ी (सम्मेद शिखर) पर 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ सहित कुल 20 जैन तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था। यह विश्व के समस्त जैन धर्मावलंबियों का सर्वोच्च तीर्थ है।
रांची से 35 किमी दूर स्थित पतरातु घाटी अपनी जलेबी के आकार की घुमावदार सड़कों, पतरातु जलाशय के विहंगम दृश्य और नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों के लिए झारखंड का शीर्ष दर्शनीय स्थल है।
हजारीबाग क्षेत्र में जनजातीय महिलाओं द्वारा विवाह और फसल कटाई के समय घरों की मिट्टी की दीवारों पर गेरू, सफेद मिट्टी और चारकोल से बनाए जाने वाले पारंपरिक भित्ति चित्रों को सोहराई व कोहबर कला कहा जाता है।