डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज, नोंग्रियाट (चेरापूंजी)
खासी जनजाति द्वारा 'फिकस इलास्टिका' (रबर के पेड़) की द्वितीयक जड़ों को सदियों तक तराश कर बनाया गया दो मंजिला जीवित पुल, 3,500 सीढ़ियों का ट्रेक।
खासी, जयंतिया और गारो की हरी-भरी पहाड़ियों, रबर वृक्षों की जड़ों से बुने जीवित पुलों (Living Root Bridges), बादलों के घर चेरापूंजी और मौसिनराम की मूसलाधार वर्षा तथा पारदर्शी उमनगोत नदी की पावन धरा मेघालय प्रकृति का जीवंत चमत्कार है।
खासी जनजाति द्वारा 'फिकस इलास्टिका' (रबर के पेड़) की द्वितीयक जड़ों को सदियों तक तराश कर बनाया गया दो मंजिला जीवित पुल, 3,500 सीढ़ियों का ट्रेक।
340 मीटर (1,115 फीट) की ऊंचाई से सीधे खड़े कगार से गिरता भारत का सबसे ऊंचा जलप्रपात, नीचे स्थित पन्ना-हरे रंग का प्राकृतिक जलकुंड।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित इतनी पारदर्शी नदी कि उस पर तैरती नावें हवा में उड़ती हुई प्रतीत होती हैं, कयाकिंग व कैंपिंग।
2003 में 'एशिया का सबसे स्वच्छ गांव' घोषित, शत-प्रतिशत साक्षरता, बांस के कूड़ेदान, फूलों से सजे रास्ते और 85 फीट ऊंचा स्काईवॉक।
चूना पत्थर की प्राकृतिक गुफाएं, स्टैलेक्टाइट व स्टैलेग्माइट संरचनाएं, एवं भारत की सबसे लंबी गुफा क्रेम लियात प्राह (31+ किमी)।
गारो आत्माओं की भूमि बालपक्रम का विशाल कैनियन, नोकरेक बायोस्फीयर में सिट्रस इंडिका (जंगली संतरे का आदिम उद्गम) और लाल पांडा।
मेघालय का समाज विश्व के विरले मातृसत्तात्मक (Matrilineal) समाजों में से एक है, जहाँ खासी, जयंतिया और गारो जनजातियों में वंश और संपत्ति का हस्तांतरण माता से सबसे छोटी पुत्री (खादूह) को होता है। 1829 में खासी सरदार यू तिरोत सिंग ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध लड़ा। जयंतिया राजा यू कियांग नांगबाह ने 1862 में स्वाधीनता के लिए बलिदान दिया। 21 जनवरी 1972 को असम से अलग होकर मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
शिलांग पठार पर स्थित मेघालय को 'मेघों का आलय' कहा जाता है। बंगाल की खाड़ी से आने वाले मानसूनी बादलों को गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियां रोक लेती हैं, जिससे चेरापूंजी (सोहरा) और मौसिनराम में प्रतिवर्ष औसतन 11,800 मिमी वर्षा होती है जो विश्व में सर्वाधिक है। चूना पत्थर की प्रचुरता के कारण यहाँ 1,700 से अधिक प्राकृतिक गुफाएं हैं जो एशिया का सबसे सघन गुहा-तंत्र बनाती हैं।
मातृसत्तात्मक समाज में नारी का सम्मान मेघालय की नींव है। वांगला महोत्सव (100 ड्रम फेस्टिवल - गारो जनजाति) फसल कटाई का उल्लास है, जबकि नोंगक्रेम नृत्य खासी समुदाय का प्रमुख सांस्कृतिक पर्व है। 'जिंगरवई लावबेई' (कोंगथोंग गांव) में प्रत्येक व्यक्ति का नाम किसी शब्द से नहीं बल्कि एक अनूठी सीटी की धुन (Lullaby) से पुकारा जाता है। जादोह (चावल और मांस), दोहनेइहियोंग (काले तिल की ग्रेवी), और तुंग्र्यंबाई यहाँ के पारंपरिक व्यंजन हैं।
मेघालय भ्रमण का सबसे सुखद समय अक्टूबर से मई है जब मौसम सुहाना होता है और नदियां क्रिस्टल-क्लियर होती हैं। हालांकि, नोहकलिकाई और सेवेन सिस्टर्स जैसे विशाल झरनों के उग्र सौंदर्य को देखने के लिए मानसून (जुलाई-अगस्त) का अनुभव अद्वितीय है। नोंग्रियाट के डबल डेकर रूट ब्रिज के लिए 3,500 खड़ी सीढ़ियां उतरनी और चढ़नी पड़ती हैं, अतः इसके लिए अच्छी शारीरिक फिटनेस आवश्यक है।
खासी और जयंतिया जनजातियाँ 'फिकस इलास्टिका' (भारतीय रबर का पेड़) की हवाई जड़ों को खोखले सुपारी के तनों के सहारे नदी के आर-पार निर्देशित करती हैं। धीरे-धीरे जड़ें नदी के उस पार मिट्टी में जड़ पकड़ लेती हैं और 15-20 वर्षों में एक अत्यंत मजबूत प्राकृतिक जीवित पुल बन जाता है जो 500 वर्षों तक जीवित रहता है।
पूर्वी खासी हिल्स के कोंगथोंग गांव में मां अपने बच्चे के जन्म पर एक अनूठी धुन (Tune) रचती है जो जीवन भर उस व्यक्ति का नाम बन जाती है। ग्रामीण एक-दूसरे को नाम से नहीं बल्कि इसी विशिष्ट संगीतमय सीटी से पुकारते हैं। इसे 'जिंगरवई लावबेई' परंपरा कहते हैं।
उमनगोत नदी शिलांग की प्रदूषण-मुक्त पहाड़ियों से निकलती है और इसके तल में केवल चिकने गोल कंकड़-पत्थर और रेत हैं, कोई कीचड़ नहीं। स्थानीय ग्रामीणों द्वारा कड़े स्वच्छता नियमों के पालन से इसका पानी कांच की भांति पारदर्शी रहता है।
मौसिनराम की भौगोलिक स्थिति कीप (Funnel) के आकार की खासी पहाड़ियों के मध्य है। बंगाल की खाड़ी से उठने वाली मानसूनी मानसूनी हवाएं यहाँ फंस जाती हैं और ऊपर उठकर अत्यधिक संघनित होकर प्रतिवर्ष लगभग 11,872 मिमी भीषण वर्षा करती हैं।