7वीं सदी के राजा अजयपाल चौहान की नगरी व ख्वाजा गरीब नवाज का अमर आशियाना

अजमेर: सूफी साधना का विश्व केंद्र, चौहान शौर्य एवं तारागढ़ दुर्ग

अरावली की नाग पहाड़ी की तलहटी में बसा अजमेर भारत की गंगा-जमुनी तहजीब, सूफी आध्यात्मिकता और राजपूत शौर्य का अद्वितीय संगम है। 7वीं शताब्दी में शाकंभरी के चौहान राजा अजयपाल द्वारा स्थापित यह नगर अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय की कर्मभूमि रहा। 12वीं सदी के महान सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह शरीफ के कारण अजमेर समूचे विश्व में सर्वधर्म समभाव, शांति और दुआओं की पवित्र स्थली के रूप में वंदनीय है।

Ajmer (राजस्थान): मुख्य विवरण एवं यात्रा सांख्यिकी
स्थापना वर्ष
7वीं सदी ई. (राजा अजयपाल चौहान)
आध्यात्मिक महत्व
ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह शरीफ (चिश्तिया सिलसिला)
प्रमुख दुर्ग
तारागढ़ दुर्ग (भारत के प्राचीनतम पहाड़ी दुर्गों में)
प्रमुख झील
आना सागर झील (1135-1150 ई., अर्णोराज चौहान)
निकटतम रेलवे स्टेशन
अजमेर जंक्शन (AII - प्रमुख रेल मंडल)
निकटतम हवाई अड्डा
किशनगढ़ एयरपोर्ट (KQH - 28 किमी)

प्रमुख दर्शनीय स्थल एवं स्थापत्य धरोहर

सूफी तीर्थ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह शरीफ

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह शरीफ

विश्व प्रसिद्ध सूफी दरगाह जहां प्रतिवर्ष लाखों अकीदतमंद चादर और दुआएं पेश करते हैं, बुलंद दरवाजा और विशाल देग।

चौहान दुर्ग तारागढ़ दुर्ग (अजयमेरु दुर्ग)

तारागढ़ दुर्ग (अजयमेरु दुर्ग)

नाग पहाड़ी पर स्थित भारत का प्राचीनतम गिरि दुर्ग, जहां से पूरे अजमेर नगर और अरावली घाटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

प्राचीन स्मारक अढ़ाई दिन का झोंपड़ा

अढ़ाई दिन का झोंपड़ा

1192 में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित भारत की सबसे पुरानी जीवित मस्जिदों में से एक, जो मूलतः संस्कृत महाविद्यालय था।

झील एवं उद्यान आना सागर झील एवं बारादरी

आना सागर झील एवं बारादरी

पृथ्वीराज चौहान के दादा अर्णोराज द्वारा निर्मित कृत्रिम झील, जिसके किनारे शाहजहां ने संगमरमरी बारादरी बनवाई थी।

1. चौहान साम्राज्य की राजधानी से सूफी केंद्र तक का सफर

अजमेर का मूल नाम 'अजयमेरु' (अजेय पर्वत) था जिसकी स्थापना चौहान वंशीय राजा अजयपाल ने की थी। 12वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में यह उत्तर भारत की महाशक्ति बना। 1192 के तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद यहां सल्तनत और बाद में मुगलों का आधिपत्य हुआ। 1191 में मदीना से भारत पधारे सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर को अपनी तपोभूमि बनाया। उनके प्रेम, सद्भाव और गरीबों की सेवा के संदेश ने उन्हें 'गरीब नवाज' का अमर खिताब दिलाया।

2. दरगाह शरीफ का स्थापत्य और उर्स की परंपरा

दरगाह शरीफ परिसर में प्रवेश करते ही निजाम गेट, शाहजहानी गेट और सुल्तान महमूद खिलजी द्वारा निर्मित 75 फीट ऊंचा बुलंद दरवाजा भव्यता प्रकट करते हैं। मजार शरीफ पर चांदी का कटघरा और संगमरमरी गुंबद है। यहां अकबर और जहांगीर द्वारा भेंट की गई दो विशाल तांबे की देग (बड़ी देग और छोटी देग) रखी हैं, जिनमें हजारों किलो चावल, मेवे और केसर की खीर पकाई जाकर गरीबों में बांटी जाती है। रजब माह में आयोजित होने वाला उर्स मेला दुनिया भर के अकीदतमंदों को आकर्षित करता है।

3. अढ़ाई दिन का झोंपड़ा एवं आना सागर की शाम

तारागढ़ की तलहटी में स्थित अढ़ाई दिन का झोंपड़ा इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का दुर्लभ नमूना है। 1199 में निर्मित इस इमारत के 124 खंभों पर प्राचीन भारतीय नक्काशी और पीले बलुआ पत्थर की 7 मेहराबें हैं जिन पर अरबी में कुरान की आयतें खुदी हैं। शहर के केंद्र में फैली आना सागर झील में शाम को स्थानीय लोग और प्रवासी पक्षी एकत्र होते हैं। झील के किनारे सुभाष उद्यान और शाहजहां की 5 संगमरमरी बारादरियां शांत सूर्यास्त का आनंद देती हैं।

4. सोनी जी की नसियां एवं अजमेरी सोहन हलवा

अजमेर का दिगंबर जैन मंदिर 'सोनी जी की नसियां' (लाल मंदिर) अपने स्वर्ण कक्ष के लिए विख्यात है। 1895 में बने इस कक्ष में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जीवन और अयोध्या की स्वर्ण नगरी का विशाल लकड़ी पर सोने का प्रतिरूप प्रदर्शित है। अजमेर की यात्रा यहां के दरगाह बाजार में मिलने वाले शुद्ध देशी घी के कड़क 'सोहन हलवे', बादाम शेक और कचौरी के बिना पूरी नहीं हो सकती।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में जियारत का सबसे अच्छा समय क्या है?

सुबह तड़के खिदमत के समय (सुबह 5:00 से 7:00) या शाम को मगरिब की नमाज के बाद का समय सबसे शांत और आध्यात्मिक अनुभव देता है।

अजमेर से पुष्कर की दूरी कितनी है और कैसे पहुंचे?

अजमेर से पुष्कर मात्र 14 किमी दूर है। नाग पहाड़ी को पार करते हुए टैक्सी, ऑटो या बस द्वारा 25 से 30 मिनट में आसानी से पहुंचा जा सकता है।

अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का नाम ऐसा क्यों पड़ा?

मान्यता है कि 1192 में इसका रूपांतरण केवल ढाई दिन (60 घंटे) में पूरा किया गया था, अथवा यहां ढाई दिन का पंजाब शाह का उर्स लगता था, जिसके कारण यह नाम प्रचलित हुआ।

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