जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला)
बिना चूने-गारे के केवल पीले पत्थरों की इंटरलॉकिंग से बना 99 बुर्जों वाला दुर्ग, जिसमें 7 प्राचीन जैन मंदिर स्थित हैं।
थार मरुस्थल की अंतहीन स्वर्ण बालू के बीच त्रिकूटा पहाड़ी पर सूर्य की किरणों से दमकता जैसलमेर भारत की मध्यकालीन मरु-सभ्यता का मुकुट है। 1156 में भाटी राजपूत शासक महारावल जैसल द्वारा स्थापित यह नगर अपने पीले बलुआ पत्थर के अद्वितीय प्रयोग के कारण 'स्वर्ण नगरी' (गोल्डन सिटी) कहलाता है। जैसलमेर का सोनार किला विश्व का दुर्लभतम 'जीवंत दुर्ग' (Living Fort) है, जहां आज भी नगर की एक-चौथाई आबादी दुर्ग के भीतर निवास करती है।
बिना चूने-गारे के केवल पीले पत्थरों की इंटरलॉकिंग से बना 99 बुर्जों वाला दुर्ग, जिसमें 7 प्राचीन जैन मंदिर स्थित हैं।
1805 में पांच धनी पटवा भाइयों द्वारा निर्मित पांच हवेलियों का संकुल, जिसकी जालीदार खिड़कियां पत्थर पर फीते जैसी दिखती हैं।
जैसलमेर से 40 किमी दूर थार मरुस्थल के लहरदार बालू के टीले, जहां ऊंट सफारी, जीप ड्यून बैशिंग और तारों भरी रात में कैंपिंग होती है।
1367 में महारावल गड़सी द्वारा निर्मित ऐतिहासिक वर्षा जल संचयन झील, जिसके तट पर सुंदर छतरियां और टीलों की प्रोल स्थित है।
मध्यकाल में जैसलमेर भारत, मध्य एशिया, फारस और मिस्र के बीच चलने वाले कारवां व्यापार मार्ग (सिल्क रूट) का प्रमुख पड़ाव था। अफीम, रेशम, मसाले और घोड़ों के व्यापारियों से चुंगी वसूल कर भाटी शासक और स्थानीय ओसवाल व्यापारी अपार समृद्ध हुए। इसी संपदा से उन्होंने त्रिकूटा पर्वत पर 99 बुर्जों वाले अभेद्य दुर्ग का निर्माण किया और नगर में ऐसी हवेलियां बनवाईं जिनकी पाषाण नक्काशी दुनिया भर में बेजोड़ मानी जाती है।
सोनार किले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कोई निर्जन खंडहर या केवल संग्रहालय नहीं है, बल्कि यहां लगभग 4,000 लोग, दुकानें, कैफे और होटल दुर्ग के भीतर संचालित होते हैं। दुर्ग के अंदर 12वीं से 15वीं शताब्दी के मध्य बने 7 पीले व सफेद संगमरमर के जैन मंदिर स्थापत्य की उत्कृष्ट मिसाल हैं, जिनके भूमिगत ज्ञान भंडार में ताड़पत्रों पर लिखी 1,000 वर्ष से अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित हैं।
जैसलमेर की हवेलियां थार की भीषण लू और धूल भरी आंधियों से बचने के लिए बनाई गई वैज्ञानिक कृतियां हैं। पटवों की हवेली की प्रत्येक बालकनी और झरोखा दूसरी से भिन्न है। नथमल की हवेली को दो सगे भाइयों (हाथी और लालू) ने एक साथ बिना किसी ब्लूप्रिंट के बनाया, फिर भी दोनों हिस्सों में गजब का तालमेल है। सलीम सिंह की हवेली का शीर्ष भाग मोर के पंखों की तरह फैला हुआ है, जिसे 'जहाज महल' भी कहा जाता है।
जैसलमेर की शाम थार के धोरों में ढलती है। सैम और खुहड़ी के रेतीले टीलों पर जब सूर्यास्त की लालिमा फैलती है, तो रेगिस्तान सोने की चादर जैसा चमकता है। रात में कैंप में अलाव के चारों ओर लंगा और मांगणियार लोक कलाकारों द्वारा गाया जाने वाला 'केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस' और कालबेलिया नर्तकियों का चकरी नृत्य मरुस्थल की आत्मा को जीवंत कर देता है।
क्योंकि यह विश्व के उन गिने-चुने किलों में है जहां आज भी आम नागरिक, कारीगर और व्यापारी निवास करते हैं। किले के भीतर करीब 800 परिवार पीढ़ियों से रह रहे हैं।
सैम सैंड ड्यून्स (Sam Sand Dunes) सबसे लोकप्रिय है जहां लक्जरी टेंट और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जबकि शांत व कम भीड़-भाड़ वाले अनुभव के लिए खुहड़ी (Khuri) बेहतर विकल्प है।
मरु महोत्सव हर वर्ष माघ माह की पूर्णिमा (आमतौर पर जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत) में सैम के धोरों पर 3 दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है।
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