मेहरानगढ़ दुर्ग
भारत के विशालतम किलों में से एक, जिसकी प्राचीरों से पूरी नीली नगरी का विहंगम दृश्य और राठौड़ तोपें दिखाई देती हैं।
थार मरुस्थल के प्रवेश द्वार पर 125 मीटर ऊंची चीड़ियाटूंक पहाड़ी पर खड़ा मेहरानगढ़ दुर्ग मानो मारवाड़ के शौर्य का अमर पहरेदार है। 1459 में राव जोधा द्वारा स्थापित जोधपुर विश्व भर में अपनी इंडिगो नीली गलियों ('ब्लू सिटी') के लिए विख्यात है। रुद्रयार्ड किपलिंग ने जिस दुर्ग को 'देवताओं, परियों और दानवों द्वारा निर्मित' बताया था, वह मेहरानगढ़, श्वेत संगमरमरी जसवंत थड़ा और विश्व के विशालतम निजी आवासों में गिने जाने वाले उम्मेद भवन पैलेस का स्वामी नगर है।
भारत के विशालतम किलों में से एक, जिसकी प्राचीरों से पूरी नीली नगरी का विहंगम दृश्य और राठौड़ तोपें दिखाई देती हैं।
1899 में महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में निर्मित महीन नक्काशीदार श्वेत संगमरमर का स्मारक, जिसे 'मारवाड़ का ताजमहल' कहा जाता है।
1943 में अकाल राहत कार्य के रूप में निर्मित 347 कमरों वाला सुनहरे चित्तर बलुआ पत्थर का आर्ट डेको राजप्रासाद।
मेहरानगढ़ की तलहटी में नीले रंगों से पुते सदियों पुराने मकान, जो गर्मी से बचाव और पारंपरिक पहचान का प्रतीक हैं।
1459 में मारवाड़ के राठौड़ शासक राव जोधा ने अपनी पुरानी राजधानी मंडोर को असुरक्षित पाकर एक अभेद्य पहाड़ी पर दुर्ग की नींव रखी। मान्यता है कि यहां साधना करने वाले सिद्ध योगी चीड़ियानाथ जी को हटाने के कारण उन्होंने श्राप दिया था कि दुर्ग में जल संकट रहेगा। इस श्राप के निवारण हेतु राजा ने कई कृत्रिम जलाशयों (रानीसर, पदमसर) का निर्माण करवाया और दुर्ग की प्राचीरों को इतना सुदृढ़ बनाया कि सदियों के युद्धों और तोप के गोलों के निशान आज भी जय पोल और लोहा पोल पर वीरता के साक्षी के रूप में दर्ज हैं।
जोधपुर के पुराने शहर, विशेषकर चांदपोल, नवचौकिया और ब्रह्मपुरी क्षेत्रों में अधिकांश मकान गहरे नीले रंग में रंगे हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: पहला, पारंपरिक रूप से चूने में तांबे का सल्फेट (नीला थोथा) मिलाया जाता था जो दीमकों, कीड़ों को दूर रखता है और अत्यधिक मरुस्थलीय धूप में घरों को शीतल रखता है। दूसरा, यह रंग ऐतिहासिक रूप से विद्वान ब्राह्मणों के आवासों की पहचान था, जो कालान्तर में पूरे नगर का वैश्विक पहचान चिह्न बन गया।
महाराजा उम्मेद सिंह ने 1929 से 1943 के मध्य भयंकर अकाल के समय प्रजा को रोजगार देने के लिए उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण करवाया। ब्रिटिश वास्तुकार हेनरी लैनचेस्टर द्वारा डिजाइन किया गया यह महल बिना किसी गारे या सीमेंट के, केवल खांचेदार पत्थरों को जोड़कर (इंटर लॉकिंग तकनीक) बनाया गया है। आज इसका एक हिस्सा लक्जरी होटल, एक हिस्सा संग्रहालय और एक हिस्सा वर्तमान राजपरिवार का निजी निवास है।
जोधपुर का खानपान भारत में सबसे चटपटा और समृद्ध माना जाता है। घंटाघर के सरदार मार्केट में मिलने वाला बेसन की मोटी कुरकुरी परत में लिपटा मिर्ची बड़ा, घी में डूबी मीठी मावा कचौरी, प्याज कचौरी और लपसी हर यात्री को मंत्रमुग्ध कर देती है। इसके अलावा हस्तशिल्प में जोधपुरी बंधेज साड़ियां, चमड़े की नक्काशीदार मोजड़ियां और जोधपुरी साफा (पगड़ी) विश्व प्रसिद्ध हैं।
चूने में नीला रंग मिलाकर पोतने से दीमक दूर रहते हैं और भीषण गर्मी में घर के अंदर ठंडक बनी रहती है। साथ ही यह मारवाड़ की सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक है।
मेहरानगढ़ के विशाल संग्रहालय, प्राचीर, तोपखाने और शीश महल को अच्छी तरह देखने के लिए कम से कम 3 से 4 घंटे का समय चाहिए।
मिर्ची बड़ा, प्याज कचौरी, मावा कचौरी, शाही समोसा, कढ़ी कचोरी और मखनिया लस्सी जोधपुर के सबसे लोकप्रिय व्यंजन हैं।
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