जगतपिता ब्रह्मा मंदिर
विश्व का सर्वाधिक प्रतिष्ठित ब्रह्मा मंदिर, जिसमें चतुर्मुखी ब्रह्मा जी की प्रतिमा, चांदी के सिक्कों से जड़ा फर्श और हंस का वाहन है।
अरावली की नाग पहाड़ियों से घिरी अर्धचंद्राकार घाटी में बसा पुष्कर भारत के सर्वाधिक प्राचीन और पवित्र तीर्थों का राजा ('तीर्थराज') है। पद्म पुराण के अनुसार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के कर-कमलों से गिरे तीन कमलों से इस पवित्र सरोवर का प्राकट्य हुआ। विश्व भर में भगवान ब्रह्मा का एकमात्र प्रमुख सक्रिय देवालय, 52 पवित्र स्नान घाट, वराह मंदिर, सावित्री पहाड़ी की केबल कार और कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला विश्वप्रसिद्ध पुष्कर ऊंट व सांस्कृतिक मेला इस नगर को एक अलौकिक आध्यात्मिक पहचान देते हैं।
विश्व का सर्वाधिक प्रतिष्ठित ब्रह्मा मंदिर, जिसमें चतुर्मुखी ब्रह्मा जी की प्रतिमा, चांदी के सिक्कों से जड़ा फर्श और हंस का वाहन है।
चारों ओर से मंदिरों से घिरा पवित्र जल कुंड जहां वराह घाट, ब्रह्म घाट और गऊ घाट पर संध्या महाआरती होती है।
नगर से 750 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित माता सावित्री का मंदिर, जहां सीढ़ियों अथवा रोपवे द्वारा पहुंचकर सूर्योदय का विहंगम दृश्य मिलता है।
कार्तिक माह में 50,000 से अधिक अलंकृत ऊंटों, घोड़ों, मूंछ प्रतियोगिता और लोक संगीत का विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक मेला।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, दानव वज्रनाभ के संहार हेतु भगवान ब्रह्मा ने अपने कमल पुष्प से प्रहार किया। कमल की पंखुड़ियां तीन स्थानों पर गिरीं जिससे ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ पुष्कर सरोवर प्रकट हुए। इसके उपरांत ब्रह्मा जी ने यहां सृष्टि कल्याण हेतु महायज्ञ का संकल्प लिया। यज्ञ के समय उनकी पत्नी माता सावित्री के उपस्थित न होने पर उन्होंने स्थानीय गूजर कन्या गायत्री से विवाह कर यज्ञ पूर्ण किया। इस पर क्रोधित होकर माता सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि पुष्कर के अतिरिक्त पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं उनकी पूजा नहीं होगी। यही कारण है कि पुष्कर में ब्रह्मा जी का देवालय सर्वोच्च पूज्य है।
पुष्कर सरोवर के जल को पापमोचनी और मोक्षदायिनी माना गया है। इसके चारों ओर 52 घाट बने हैं, जिनमें 'ब्रह्म घाट' (जहां ब्रह्मा जी ने स्नान किया था), 'वराह घाट' (भगवान विष्णु के वराह अवतार स्थल) और 'गऊ घाट' (जहां महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की अस्थियां विसर्जित की गई थीं) अत्यंत पवित्र हैं। प्रतिदिन सूर्यास्त के समय जब सैकड़ों शंख, घंटे और 52 घाटों पर एक साथ दीपकों की आरती जलती है, तो सरोवर का जल स्वर्णिम आभा से दमक उठता है।
प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक आयोजित होने वाला पुष्कर मेला भारत का सबसे रंग-बिरंगा सांस्कृतिक उत्सव है। थार मरुस्थल के हजारों पशुपालक अपने सजे-धजे ऊंटों, मारवाड़ी घोड़ों और बैलों के साथ यहां व्यापार हेतु आते हैं। मेले में 'सबसे लंबी मूंछ प्रतियोगिता', 'पगड़ी बांधने की होड़', मटका दौड़, हॉट एयर बैलूनिंग और कबीर कैफे जैसे लोक संगीत संकुल वैश्विक पर्यटकों को सम्मोहित करते हैं।
पुष्कर पूरे भारत में अपने देशी घी के गरमा-गरम रसीले 'मालपुए' और रबड़ी के लिए जाना जाता है। साथ ही 1970 के दशक से इजरायली और यूरोपीय बैकपैकर्स की पसंदीदा जगह होने के कारण यहां की गलियों में फलाफेल, हम्मस और इजरायली शेक भी लोकप्रिय हैं। पुष्कर को राजस्थान का 'गुलाब नगर' भी कहा जाता है, जहां के चेती गुलाब से बना शुद्ध गुलकंद, गुलाब जल और इत्र विश्व भर में निर्यात होता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता सावित्री ने यज्ञ में उनकी जगह गायत्री को बैठाने पर रुष्ट होकर ब्रह्मा जी को श्राप दिया था कि संपूर्ण पृथ्वी पर केवल पुष्कर में ही उनकी पूजा की जाएगी।
पुष्कर मेला हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह (अक्टूबर या नवंबर) में लगता है और कार्तिक पूर्णिमा के पवित्र स्नान के साथ संपन्न होता है।
सावित्री माता मंदिर रत्नागिरी पहाड़ी पर स्थित है। वहां पहुंचने के लिए लगभग 1,000 सीढ़ियों की चढ़ाई है, अथवा आधुनिक पुष्कर रोपवे (Ropeway) द्वारा 6 मिनट में पहुंचा जा सकता है।
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