भू-बैकुंठ एवं मोक्ष धाम

श्री बद्रीनाथ धाम, उत्तराखंड: चार धाम इतिहास, तप्त कुंड व दर्शन गाइड

मुख्य दर्शन विवरण एवं यात्रा तथ्य
कपाट खुलने का समय
अप्रैल/मई (अक्षय तृतीया के बाद)
शीतकालीन बंदी
अक्टूबर/नवंबर (कार्तिक पूर्णिमा/दीपावली)
पवित्र स्नान कुंड
तप्त कुंड (प्राकृतिक गर्म गंधक जल)
शीतकालीन गद्दी स्थल
नृसिंह मंदिर, जोशीमठ
निकटतम रेलवे स्टेशन
ऋषिकेश / योगनगरी ऋषिकेश (295 किमी)
निकटतम हवाई अड्डा
जॉली ग्रांट, देहरादून (310 किमी)

गढ़वाल हिमालय में नर और नारायण पर्वतों की धवल शिखाओं के मध्य, नीलकंठ पर्वत की पृष्ठभूमि में स्थित श्री बद्रीनाथ धाम सनातन धर्म के सर्वोच्च 'चार धामों' (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम) में से एक है। स्कंद पुराण के 'केदारखंड' में स्पष्ट उद्घोष है कि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बद्रीनाथ के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं है।

पौराणिक उत्पत्ति एवं 'बद्री' नामकरण का रहस्य

पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में जब भगवान नारायण ने सृष्टि के कल्याण हेतु इस घोर हिम प्रदेश में ध्यानमग्न होकर कठोर तपस्या प्रारंभ की, तब शीत, वर्षा और हिमपात से उनकी रक्षा करने के लिए माता लक्ष्मी ने स्वयं को एक विशाल 'बद्री' (जंगली बेर) के वृक्ष के रूप में परिवर्तित कर लिया और भगवान के ऊपर छत्र बनकर खड़ी रहीं।

हजारों वर्षों की तपस्या पूर्ण होने पर जब भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के इस अनन्य त्याग को देखा, तो उन्होंने वरदान दिया कि इस पावन क्षेत्र में उनका नाम माता के साथ संयुक्त होकर 'बद्रीनारायण' या 'बद्रीनाथ' के रूप में ही पूजा जाएगा।

"कृते जनार्दनः पूज्यो त्रेतायां रघुनन्दनः।
द्वापरे रामकृष्णौ तु कलौ श्रीबदरीपतिः॥"

आदि शंकराचार्य द्वारा पुनरुद्धार और शालिग्राम विग्रह

8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने नारद कुंड से भगवान बद्रीनारायण की स्वयंभू चतुर्भुज शालिग्राम शिला विग्रह को बाहर निकाला और उसे वर्तमान मंदिर में प्रतिष्ठित किया:

स्थापत्य एवं परिसर के दिव्य अंग

बद्रीनाथ मंदिर पारंपरिक हिमाचली-गढ़वाली पैगोडा प्रस्तर शैली में निर्मित है। इसके तीन मुख्य भाग हैं—गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप।

दैनिक पूजा एवं आरती समय

  • महाभिषेक एवं प्रातः पूजा: भोर 04:30 से 06:30 बजे तक
  • सामान्य दर्शन: प्रातः 06:30 से दोपहर 12:00 बजे तक
  • विश्राम व पट बंद: दोपहर 12:00 से अपराह्न 03:00 बजे तक
  • अपराह्न दर्शन: अपराह्न 03:00 से सायंकाल 07:00 बजे तक
  • सायंकालीन गीत गोविंद आरती: सायंकाल 08:30 से 09:00 बजे तक (कपाट बंदी)

कैसे पहुंचें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

बद्रीनाथ के कपाट प्रतिवर्ष अप्रैल-मई में अक्षय तृतीया के आसपास खुलते हैं और नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा के बाद शीतकाल के लिए बंद हो जाते हैं।
नहीं, बद्रीनाथ मंदिर तक मोटर योग्य पक्की सड़क जाती है। वाहन सीधे मंदिर से मात्र 200-300 मीटर की दूरी पर पार्किंग स्थल तक पहुंचते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्म कपाल शिला पर एक बार पितरों का तर्पण व श्राद्ध करने से उन्हें स्थायी मोक्ष मिल जाता है और पुनः कभी श्राद्ध की आवश्यकता नहीं रहती।