गढ़वाल हिमालय में नर और नारायण पर्वतों की धवल शिखाओं के मध्य, नीलकंठ पर्वत की पृष्ठभूमि में स्थित श्री बद्रीनाथ धाम सनातन धर्म के सर्वोच्च 'चार धामों' (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम) में से एक है। स्कंद पुराण के 'केदारखंड' में स्पष्ट उद्घोष है कि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बद्रीनाथ के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं है।
पौराणिक उत्पत्ति एवं 'बद्री' नामकरण का रहस्य
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में जब भगवान नारायण ने सृष्टि के कल्याण हेतु इस घोर हिम प्रदेश में ध्यानमग्न होकर कठोर तपस्या प्रारंभ की, तब शीत, वर्षा और हिमपात से उनकी रक्षा करने के लिए माता लक्ष्मी ने स्वयं को एक विशाल 'बद्री' (जंगली बेर) के वृक्ष के रूप में परिवर्तित कर लिया और भगवान के ऊपर छत्र बनकर खड़ी रहीं।
हजारों वर्षों की तपस्या पूर्ण होने पर जब भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के इस अनन्य त्याग को देखा, तो उन्होंने वरदान दिया कि इस पावन क्षेत्र में उनका नाम माता के साथ संयुक्त होकर 'बद्रीनारायण' या 'बद्रीनाथ' के रूप में ही पूजा जाएगा।
"कृते जनार्दनः पूज्यो त्रेतायां रघुनन्दनः।
द्वापरे रामकृष्णौ तु कलौ श्रीबदरीपतिः॥"
आदि शंकराचार्य द्वारा पुनरुद्धार और शालिग्राम विग्रह
8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने नारद कुंड से भगवान बद्रीनारायण की स्वयंभू चतुर्भुज शालिग्राम शिला विग्रह को बाहर निकाला और उसे वर्तमान मंदिर में प्रतिष्ठित किया:
- पद्मासन मुद्रा: बद्रीनारायण का विग्रह 3.3 फीट ऊंचा काले शालिग्राम पत्थर से बना है। अन्य वैष्णव विग्रहों के विपरीत, यहां भगवान विष्णु ध्यानलीन 'पद्मासन' मुद्रा में विराजते हैं।
- रावल परंपरा: आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मर्यादा के अनुसार, बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी को 'रावल' कहा जाता है, जो अनिवार्य रूप से केरल के नंबूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से होते हैं।
स्थापत्य एवं परिसर के दिव्य अंग
बद्रीनाथ मंदिर पारंपरिक हिमाचली-गढ़वाली पैगोडा प्रस्तर शैली में निर्मित है। इसके तीन मुख्य भाग हैं—गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप।
- तप्त कुंड: मंदिर की सीढ़ियों के नीचे स्थित यह प्राकृतिक उष्ण जल कुंड 50°C तापमान पर उबलता है। श्रद्धालु शून्य से नीचे के तापमान में भी इसमें स्नान कर थकान मुक्त होते हैं।
- ब्रह्म कपाल: मंदिर से कुछ ही दूरी पर अलकनंदा तट पर स्थित वह पावन शिला चबूतरा, जहां पूर्वजों का पिंडदान करने से उन्हें अक्षय मोक्ष की प्राप्ति होती है और गया जाने की आवश्यकता नहीं रहती।
- माणा ग्राम (प्रथम भारतीय गांव): बद्रीनाथ से मात्र 3 किमी आगे भारत का सीमावर्ती गांव माणा स्थित है, जहां व्यास गुफा, गणेश गुफा और सरस्वती नदी का उद्गम (भीम पुल) दर्शनीय है।
दैनिक पूजा एवं आरती समय
- महाभिषेक एवं प्रातः पूजा: भोर 04:30 से 06:30 बजे तक
- सामान्य दर्शन: प्रातः 06:30 से दोपहर 12:00 बजे तक
- विश्राम व पट बंद: दोपहर 12:00 से अपराह्न 03:00 बजे तक
- अपराह्न दर्शन: अपराह्न 03:00 से सायंकाल 07:00 बजे तक
- सायंकालीन गीत गोविंद आरती: सायंकाल 08:30 से 09:00 बजे तक (कपाट बंदी)
कैसे पहुंचें
- सड़क मार्ग: बद्रीनाथ धाम ऋषिकेश से राष्ट्रीय राजमार्ग 7 (NH-7) द्वारा देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और जोशीमठ होते हुए सीधे जुड़ा हुआ है (दूरी: 295 किमी)।
- हेलीकॉप्टर सेवा: देहरादून (सहस्त्रधारा) और फाटा/गोविंदघाट से बद्रीनाथ के लिए चार धाम हेलीकॉप्टर सेवाएं उपलब्ध हैं।