केदारनाथ धाम, रुद्रप्रयाग
समुद्र तल से 3,584 मीटर पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि शंकराचार्य समाधि, मंदाकिनी घाटी और भगवान शिव का सर्वोच्च धाम।
मंदाकिनी, अलकनंदा और भागीरथी के पवित्र संगमों से मिलकर बहती मां गंगा, बारहवें ज्योतिर्लिंग केदारनाथ, बद्री विशाल, फूलों की घाटी और नंदा देवी की पावन हिमालयी देवभूमि।
समुद्र तल से 3,584 मीटर पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि शंकराचार्य समाधि, मंदाकिनी घाटी और भगवान शिव का सर्वोच्च धाम।
अलकनंदा तट पर नर-नारायण पर्वत के मध्य स्थित भगवान विष्णु का महातीर्थ, तप्त कुंड, ब्रह्म कपाल और अंतिम भारतीय ग्राम माणा।
विश्व की योग राजधानी, परमार्थ निकेतन गंगा आरती, रिवर राफ्टिंग, बीटल्स आश्रम और हिमालय प्रवेश द्वार।
पवित्र ब्रह्मकुंड पर प्रतिदिन संध्या समय होने वाली विश्वप्रसिद्ध गंगा महाआरती, कुंभ मेला स्थल और मनसा देवी शक्तिपीठ।
यूनेस्को विश्व धरोहर अल्पाइन वैली जहाँ सैकड़ों दुर्लभ प्रजातियों के जंगली फूल खिलते हैं, एवं 4,329 मीटर पर स्थित गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब।
1936 में स्थापित भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान, रामगंगा नदी की घाटी, रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी और 600+ पक्षी प्रजातियां।
उत्तराखंड को ऋग्वेद, महाभारत और स्कंद पुराण के केदारखंड (गढ़वाल) व मानसखंड (कुमाऊं) में दिव्य तपोभूमि के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। कत्यूरी राजवंश, गढ़वाल के पंवार (परमार) राजा और कुमाऊं के चंद राजाओं ने कलात्मक पाषाण मंदिरों (जैसे जागेश्वर और बैजनाथ) का निर्माण कराया। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म के पुनरुत्थान हेतु बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम की पुनर्प्रतिष्ठा की। चिपको आंदोलन (गौरा देवी) ने पर्यावरण चेतना को विश्वव्यापी विस्तार दिया।
उत्तराखंड का 86% से अधिक भूभाग पर्वतीय है। यहाँ भारत की दो सबसे पवित्र नदियां—गंगा (गंगोत्री से भागीरथी रूप में) और यमुना (यमुनोत्री से) निकलती हैं। पंचप्रयाग (विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग) में पवित्र धाराओं के मिलन से गंगा का पूर्ण स्वरूप प्रकट होता है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में विस्तृत हरी-भरी अल्पाइन चरागाहों को 'बुग्याल' (जैसे दयारा बुग्याल, बेदनी बुग्याल) कहा जाता है।
उत्तराखंड की लोक संस्कृति में 'जागर' (देवताओं का आह्वान), झोड़ा-चांचरी और पांडव नृत्य का विशेष स्थान है। कंडाली महोत्सव, नंदा देवी राजजात यात्रा (एशिया की सबसे लंबी पैदल तीर्थयात्रा) और कुंभ मेला यहाँ की आस्था के स्तंभ हैं। कुमाऊंनी ऐपण (Aipan) पारंपरिक फर्श चित्रकला विश्व प्रसिद्ध है। बाल मिठाई, झंगोरे की खीर, काफली (पालक-मेथी व्यंजन) और गहत की दाल पहाड़ी पौष्टिकता के परिचायक हैं।
चार धाम यात्रा सामान्यतः मई से अक्टूबर तक (अक्षय तृतीया से भाई दूज तक) संचालित होती है। भारी मानसून (जुलाई-अगस्त) में पर्वतीय मार्गों पर यात्रा से बचना चाहिए। औली में स्कीइंग के लिए जनवरी-फरवरी सर्वोत्तम हैं। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना पूर्ण होने से यात्रा समय में अभूतपूर्व कमी आएगी। उच्च हिमालयी ट्रेकिंग के लिए उचित फिटनेस और गाइड आवश्यक है।
धार्मिक मान्यतानुसार चार धाम यात्रा पश्चिम से पूर्व की ओर की जाती है: 1. यमुनोत्री (मां यमुना) → 2. गंगोत्री (मां गंगा) → 3. केदारनाथ (भगवान शिव) → 4. बद्रीनाथ (भगवान विष्णु)।
रुद्रप्रयाग जिले में 3,680 मीटर (12,073 फीट) की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। यह पंचकेदारों में तृतीय केदार है जहाँ भगवान शिव की भुजाओं की पूजा की जाती है।
फूलों की घाटी जुलाई के मध्य से अगस्त के अंत तक अपने चरम सौंदर्य पर होती है जब 500 से अधिक प्रजातियों के अल्पाइन फूल पूरी घाटी में खिलते हैं।
अल्मोड़ा के निकट कसार देवी क्षेत्र को नासा द्वारा 'वैन एलन रेडिएशन बेल्ट' का हिस्सा माना गया है, जहाँ पृथ्वी के विशिष्ट चुंबकीय क्षेत्र के कारण गहन मानसिक शांति और ध्यान की सहज अनुभूति होती है।