पैंगोंग त्सो (Pangong Tso) हिमनद झील
14,270 फीट की ऊंचाई पर 134 किमी लंबी विश्व की सबसे ऊंची खारे पानी की झील, जो दिन भर में गहरे नीले से हल्के हरे और बैंगनी रंग बदलती है।
कराकोरम और जांस्कर पर्वतमालाओं के मध्य 11,500 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित शीत मरुस्थल, नीला-फिरोजी रंग बदलती पैंगोंग त्सो झील, नुब्रा घाटी के दो-कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंट और सदियों पुराने बौद्ध गोम्पाओं से सज्जित लद्दाख भारत की सबसे विस्मयकारी उच्च-हिमालयी भूमि है।
14,270 फीट की ऊंचाई पर 134 किमी लंबी विश्व की सबसे ऊंची खारे पानी की झील, जो दिन भर में गहरे नीले से हल्के हरे और बैंगनी रंग बदलती है।
श्योक और नुब्रा नदियों का संगम, 10,000 फीट पर ठंडे रेत के टीले, सिल्क रूट के दो-कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंट और 108 फीट मैत्रेय बुद्ध (दिसकित मठ)।
17वीं सदी में राजा सेंगे नामग्याल द्वारा निर्मित 9 मंजिला तिब्बती पोटाला पैलेस जैसा राजमहल, एवं 1991 में जापानी भिक्षुओं द्वारा निर्मित श्वेत शांति स्तूप।
लद्दाख का सबसे धनी बौद्ध मठ हेमीस (वार्षिक चाम मुखौटा नृत्य) और 12 मंजिला ल्हासा के पोटाला पैलेस की प्रतिकृति थिकसे मठ (49 फीट मैत्रेय बुद्ध)।
17,582 फीट (5,359 मी) की ऊंचाई पर स्थित विश्व के सर्वोच्च मोटर-वाहन योग्य दर्रों में शुमार, जो लेह को नुब्रा और सियाचिन ग्लेशियर से जोड़ता है।
साइबेरिया के बाद विश्व का दूसरा सबसे ठंडा आबाद स्थल द्रास (-60°C तक), 1999 कारगिल युद्ध के वीर शहीदों का तोलोलिंग व टाइगर हिल मेमोरियल।
लद्दाख का इतिहास प्राचीन तिब्बती बौद्ध धर्म और सिल्क रूट के कारवां व्यापार से जुड़ा है। 10वीं सदी में स्काईद ल्दे न्गिमा गोन द्वारा स्थापित नामग्याल राजवंश ने लद्दाख पर सदियों तक शासन किया। 17वीं सदी में राजा सेंगे नामग्याल के काल में लद्दाख का साम्राज्य पश्चिमी तिब्बत तक विस्तृत हुआ। 1834 में डोगरा सेनापति जोरावर सिंह ने लद्दाख और बाल्टिस्तान को जीतकर जम्मू-कश्मीर रियासत का अंग बनाया। 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना।
लद्दाख महान हिमालय और कराकोरम पर्वतमालाओं के वृष्टि-छाया (Rain-shadow) क्षेत्र में स्थित है, जिसके कारण यहाँ मानसूनी वर्षा नहीं होती और यह एक उच्च-अक्षांशीय शीत मरुस्थल है। सिंधु नदी लद्दाख की रीढ़ है जो तिब्बत के मानसरोवर से निकलकर लेह घाटी से गुजरती है। जांस्कर नदी सर्दियों में पूरी तरह जम जाती है जिस पर विश्वप्रसिद्ध 'चादर ट्रेक' (Chadar Trek) किया जाता है। हानले में 14,764 फीट पर स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला (IAO) एशिया की सबसे ऊंची टेलीस्कोप साइट है।
लद्दाखी संस्कृति तिब्बती बौद्ध धर्म के महायान और वज्रयान संप्रदायों में रची-बसी है। हेमिस त्सेचू उत्सव पर लामाओं द्वारा रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्रों और लकड़ी के मुखौटों में किया जाने वाला 'चाम नृत्य' बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। लद्दाखी समाज में 'गोन्चा' (पारंपरिक ऊनी लबादा) और पेराक (फिरोजा जड़ी टोपी) पहनी जाती है। थुकपा, स्काईयू (सब्जी और आटे की पास्ता डिश), मोमोज, तिगमो (स्टीम्ड ब्रेड), बटर टी (गुर-गुर चाय) और छंग (जौ की पारंपरिक बीयर) यहाँ के प्रमुख आहार हैं।
लेह में उतरने के बाद पहले 24 से 48 घंटे पूरी तरह विश्राम कर 'एक्यूट माउंटेन सिकनेस' (AMS) से बचने हेतु अनुकूलन (Acclimatization) करना अनिवार्य है। पैंगोंग और नुब्रा की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट (lahdclehpermit.in) आवश्यक है। पर्याप्त पानी पिएं, कपूर पास रखें और धीरे-धीरे ऊंचाई बढ़ाएं। जून से सितंबर सड़क यात्रा (मनाली-लेह या श्रीनगर-लेह हाईवे) के लिए सबसे अनुकूल समय है।
लेह 11,562 फीट (3,524 मी) की ऊंचाई पर स्थित है जहाँ हवा में ऑक्सीजन का स्तर मैदानी इलाकों की तुलना में लगभग 30-40% कम होता है। हवाई जहाज से अचानक पहुँचने पर सिरदर्द, चक्कर और उल्टी (AMS) से बचने के लिए प्रथम 24-36 घंटे पूर्ण विश्राम अनिवार्य है।
पैंगोंग झील अत्यधिक पारदर्शी और खारी है। सूर्य की किरणों के विभिन्न कोणों, आकाश के बादलों और तलहटी में मौजूद खनिजों के परावर्तन के कारण दिन के समय इसका पानी गहरे नीले, हल्के नीले, हरे, फिरोजी और कभी-कभी लाल-बैंगनी रंग में बदलता दिखाई देता है।
लेह-कारगिल हाईवे पर स्थित मैग्नेटिक हिल पर गाड़ियां न्यूट्रल गियर में भी ढलान के ऊपर चढ़ती हुई प्रतीत होती हैं। वास्तव में यह कोई चुंबकीय शक्ति नहीं, बल्कि एक 'ऑप्टिकल इल्यूजन' (Optical Illusion) है, जहाँ आसपास के पहाड़ों की बनावट के कारण नीचे की ओर झुकी हुई सड़क ऊपर की ओर जाती हुई दिखाई देती है।
जनवरी और फरवरी के भीषण शीतकाल में (-30°C तापमान) जब जांस्कर नदी का पानी जमकर 1-2 फीट मोटी बर्फ की सफेद चादर बन जाता है, तो उस जमी हुई नदी पर 100 किमी पैदल चलना चादर ट्रेक कहलाता है। यह विश्व के सबसे साहसिक शीतकालीन ट्रेक्स में शुमार है।