कुतुब मीनार एवं गुप्त लौह स्तंभ, दिल्ली
1192 ई. की 72.5 मी ऊंची ईंटों की मीनार एवं 1,600 वर्षों से बिना जंग लगा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का 99.7% शुद्ध लौह स्तंभ।
सिन्धु घाटी के 5,000 वर्ष पुराने नगरों (धोलावीरा, लोथल) से लेकर सम्राट अशोक के धर्मलिपि स्तंभों, गुप्त कालीन चमत्कारी लौह स्तंभ, विजयनगर के पाषाण रथ और मुगलों के लाल बलुआ पत्थर के विशाल किलों तक—भारत के 74 महानतम पुरातात्विक स्मारकों का प्रामाणिक ज्ञानकोश।
1192 ई. की 72.5 मी ऊंची ईंटों की मीनार एवं 1,600 वर्षों से बिना जंग लगा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का 99.7% शुद्ध लौह स्तंभ।
1250 ई. में गंग नरेश नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित 24 अलंकृत सौर-घड़ी पहियों वाला सूर्यदेव का विशाल पाषाण रथ।
5वीं सदी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त द्वारा स्थापित विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय, यूनेस्को धरोहर।
तीसरी सदी ई.पू. में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित बौद्ध स्तूप, तोरण द्वारों पर जातक कथाएं और विश्व शांति प्रतीक।
विजयनगर साम्राज्य का अमर प्रतीक, एकाश्म ग्रेनाइट से तराशा गया गरुड़ रथ और संगीतमय सप्ताक्षर स्तंभ।
1906 ई. का स्वाधीनता सेनानियों का तीर्थ 'कालापानी', जहाँ वीर सावरकर ने 10 वर्ष कठोर कारावास झेला।
भारत में स्मारकों का निर्माण केवल राजाओं के यशगान के लिए नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय नियमों, आध्यात्मिक चेतना और लोक कल्याण के उद्देश्य से किया जाता था। मौर्य काल में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित 40 से 50 फीट ऊंचे एकाश्म चुनार बलुआ पत्थर के पॉलिशदार स्तंभ भारतीय मूर्तिकला का अप्रतिम उदाहरण हैं। गुप्त काल को भारतीय वास्तुकला का स्वर्ण युग माना जाता है जहाँ देवगढ़ के दशावतार मंदिर और महरौली के जंग-रहित लौह स्तंभ ने धातु विज्ञान का परचम लहराया।
दक्षिण भारत में चोल, पल्लव और विजयनगर राजाओं ने ग्रेनाइट पाषाणों को तराश कर गगनचुंबी गोपुरम और सहस्र स्तंभ मंडप बनाए। उत्तर भारत में खजुराहो और ओडिशा के कलिंग शिखर मंदिर नागर शैली के उत्कर्ष हैं। मध्यकाल में इंडो-इस्लामिक शैली के आगमन से मेहराब, गुंबद और ज्यामितीय चारबाग उद्यान का अद्भुत समन्वय हुआ, जैसा कि दिल्ली के हुमायूं के मकबरे और आगरा के ताजमहल में देखा जाता है।
अधिकांश राष्ट्रीय स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित हैं। पर्यटकों को स्मारकों पर ऑनलाइन टिकट (asi.payumoney.com) के माध्यम से क्यूआर कोड से प्रवेश मिलता है। स्मारकों की पाषाण दीवारों पर कुरेदना या कचरा फेंकना प्राचीन स्मारक अधिनियम 1958 के तहत दंडनीय है। स्मारकों के ऐतिहासिक संदर्भ को समझने के लिए अधिकृत गाइड की सेवाएं लें।
ASI की स्थापना 1861 में ब्रिटिश काल के दौरान सर अलेक्जेंडर कनिंघम के नेतृत्व में हुई थी, जिन्हें 'भारतीय पुरातत्व का जनक' कहा जाता है। वर्तमान में यह 3,690 से अधिक राष्ट्रीय स्मारकों का संरक्षण करता है।
सारनाथ के अशोक स्तंभ शीर्ष पर चारों दिशाओं में दहाड़ते चार एशियाई सिंह धर्म (सत्य और न्याय) के चारों दिशाओं में निर्भय प्रसार के प्रतीक हैं। नीचे चक्र (धर्म चक्र) प्रगति का द्योतक है, जिसे भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चुना गया।
यह स्तंभ 99.72% शुद्ध पिटवा लोहे (Wrought Iron) से बना है। प्राचीन धातुविदों ने लोहे में प्रचुर फास्फोरस मिलाकर उच्च तापमान पर ठोस-अवस्था में फोर्जिंग की, जिससे सतह पर 'मिसावाइट' की 1/20 मिलीमीटर सुरक्षात्मक परत बन गई जो जंग को रोकती है।