उनाकोटी के शैलकृत शिव एवं गंगावतरण, उनाकोटी
8वीं-9वीं सदी की पहाड़ियों पर तराशी गई 99,99,999 (एक करोड़ से एक कम) पाषाण मूर्तियां, 30 फीट ऊंचा काल भैरव का मुखौटा और प्राकृतिक जलप्रपात।
रुद्रसागर झील के मध्य तैरते नीरमहल, रघुनंदन पहाड़ियों पर एक करोड़ से एक कम (उनाकोटी) पाषाण-शिल्प मूर्तियां, 51 शक्तिपीठों में पावन मां त्रिपुर सुंदरी धाम और माणिक्य राजवंश के 500 वर्षों के गौरवशाली इतिहास से सज्जित त्रिपुरा पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक रत्न है।
8वीं-9वीं सदी की पहाड़ियों पर तराशी गई 99,99,999 (एक करोड़ से एक कम) पाषाण मूर्तियां, 30 फीट ऊंचा काल भैरव का मुखौटा और प्राकृतिक जलप्रपात।
1930 ई. में महाराजा वीर विक्रम द्वारा रुद्रसागर झील के मध्य निर्मित पूर्वी भारत का एकमात्र जल महल, हिंदू-इस्लामिक वास्तुकला।
51 शक्तिपीठों में जहाँ सती का दक्षिण पाद (दायां पैर) गिरा था, 1501 ई. में महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा कछुए के आकार की पहाड़ी पर निर्मित पावन धाम।
1901 ई. में महाराजा राधा किशोर माणिक्य द्वारा निर्मित विशाल श्वेत महल, मुगल शैली के फव्वारे और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत।
त्रिपुरा की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला, संतरा के बगान, साल भर सुहावना मौसम, मिजो बस्तियां और मिजोरम सीमा का विहंगम दृश्य।
दुर्गापुर के घने वन, दुर्लभ चश्माधारी बंदर (Phayre's Langur) और क्लाउडेड लेपर्ड (धूमिल तेंदुआ) राष्ट्रीय उद्यान एवं बॉटनिकल गार्डन।
त्रिपुरा का इतिहास भारत के प्राचीनतम राजवंशों में से एक 'माणिक्य राजवंश' से जुड़ा है, जिसका विवरण 'राजमाला' महाकाव्य में मिलता है। महाभारत में भी त्रिपुरा के राजा त्रिलोचन का उल्लेख मिलता है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के माणिक्य राजाओं (विशेषकर राधा किशोर माणिक्य) से अत्यंत घनिष्ठ संबंध थे और उन्होंने त्रिपुरा में कई कालजयी रचनाएं (जैसे 'राजर्षि' और 'विसर्जन') लिखीं। 15 अक्टूबर 1949 को महारानी कंचनप्रभा देवी द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद त्रिपुरा भारत का अंग बना।
त्रिपुरा तीन ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है। राज्य में उत्तर से दक्षिण की ओर फैली 5 पर्वत शृंखलाएं (जंपुई, साखान, लंगथराई, अठारामुरा और देवतमूरा) हैं। गोमती नदी राज्य की सबसे प्रमुख जलधारा है, जिस पर बना डंबरू जलाशय 48 द्वीपों से युक्त है। छाबीमुरा में गोमती नदी के किनारे 60 फीट ऊंची खड़ी चट्टानों पर तराशी गई महिषासुरमर्दिनी की विशाल पाषाण मूर्ति प्रकृति और कला का संगम है।
त्रिपुरा में त्रिपुरी, रियांग, जमातिया, चकमा और बंगाली संस्कृतियों का सुंदर समन्वय है। 'खारची पूजा' (14 देवताओं की पूजा) और 'केरिया पूजा' राज्य के महान लोक उत्सव हैं। रियांग जनजाति का 'होजागिरी' नृत्य, जिसमें नर्तकियां घड़े और थाली पर संतुलन बनाकर अद्भुत नृत्य करती हैं, विश्वविख्यात है। त्रिपुरा का बांस और बेंत हस्तशिल्प (Bamboo Crafts) भारत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मुई बोरोक (पारंपरिक मछली और सब्जी), बेर्मा (किण्वित मछली) और मोमोज यहाँ के प्रमुख स्वाद हैं।
त्रिपुरा भ्रमण का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च है। अगरतला के निकट अखौरा इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट पर भारत-बांग्लादेश सीमा की बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी अवश्य देखें। अगरतला से उनाकोटी की दूरी 170 किमी है जिसे 4 घंटे में पूरा किया जा सकता है। उदयपुर के पेड़ा और अनानास (क्वीन पाइनएप्पल - GI टैग) का स्वाद लेना न भूलें।
उनाकोटी का शाब्दिक अर्थ है 'एक करोड़ से एक कम' (99,99,999)। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव एक करोड़ देवी-देवताओं के साथ काशी जा रहे थे और यहाँ रात्रि विश्राम किया। उन्होंने सूर्योदय से पहले प्रस्थान करने को कहा, परंतु कोई अन्य देवता नहीं जागा। इस पर कुपित होकर शिव अकेले चले गए और बाकी सभी देवता पाषाण मूर्तियों में बदल गए।
1930 में निर्मित नीरमहल भारत में राजस्थान के जल महल के बाद केवल दूसरा ऐसा प्रासाद है जो पूरी तरह पानी के बीच स्थित है। यह हिंदू और मुगल स्थापत्य का मिश्रण है, जिसमें दो भाग हैं—पश्चिमी भाग (अंदर महल) राजा के परिवार के लिए और पूर्वी भाग खुला रंगमंच था।
गोमती जिले में घने जंगलों के बीच गोमती नदी की संकरी घाटी में नाव से जाते हुए दोनों ओर 100 फीट ऊंची खड़ी चट्टानों पर 15वीं-16वीं सदी की देवी दुर्गा की विशाल नक्काशीदार मूर्तियां दिखाई देती हैं, जो दक्षिण अमेरिका के वर्षावनों जैसा रोमांच देती हैं।
आषाढ़ मास में पुरानी अगरतला के चौदह देवता मंदिर में आयोजित होने वाली 7 दिवसीय खारची पूजा में 14 देवताओं (चतुर्दश देवता) की पूजा होती है। यह धरती माता की शुद्धि और लोक कल्याण का त्रिपुरा का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व है।