द माल रोड एवं जाखू मंदिर, शिमला
ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी, क्राइस्ट चर्च, ऐतिहासिक रिज मैदान एवं 108 फीट ऊंची भगवान हनुमान प्रतिमा।
धौलाधार और पीर पंजाल की हिमाच्छादित चोटियों, चीड़ व देवदार के सुरम्य वनों तथा कांगड़ा से स्पीति तक फैली प्राचीन देव संस्कृति का पावन हिमालयी राज्य।
ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी, क्राइस्ट चर्च, ऐतिहासिक रिज मैदान एवं 108 फीट ऊंची भगवान हनुमान प्रतिमा।
1553 ई. का काष्ठ-पैगोडा मंदिर, धुआंधार जलप्रपात, व्यास नदी का आलिंगन एवं अटल टनल के माध्यम से लाहुल प्रवेश।
तिब्बती बौद्ध संस्कृति का वैश्विक केंद्र, नामग्याल मठ, भागसूनाग जलप्रपात और धौलाधार के सम्मुख बसा शांत पर्वतीय नगर।
शीत मरुस्थल स्पीति का 1000 वर्ष प्राचीन बौद्ध मठ, 4,300 मीटर पर स्थित अर्धचंद्राकार चंद्रताल और कज़ा की विस्मयकारी वादियां।
विश्व के सर्वश्रेष्ठ पैराग्लाइडिंग टेक-ऑफ स्थलों में शुमार बिलिंग (2,400 मी) और शांत तिब्बती बस्तियों से युक्त बीड़।
यूनेस्को विश्व धरोहर अल्पाइन अभयारण्य, दुर्लभ हिम तेंदुआ, पश्चिमी ट्रैगोपान पक्षी और प्राचीन अनछुए ट्रेक मार्ग।
हिमाचल प्रदेश का इतिहास पौराणिक काल से महाभारत और बौद्ध दर्शन से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसे प्राचीन ग्रंथों में 'देवभूमि' कहा गया है जहाँ ऋषियों, मुनियों और पांडवों ने तपस्या की थी। मध्यकाल में यहाँ कटोच राजवंश (कांगड़ा), चम्बा के वर्मन राजा और बुशहर रियासत का शासन रहा। 1815 के गोरखा युद्ध के बाद ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा और 1864 में शिमला को ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
हिमाचल प्रदेश शिवालिक की तलहटियों से लेकर 6,000 मीटर से ऊंचे जांस्कर व पीर पंजाल शिखरों तक फैला है। यहाँ की जलवायु में अत्यधिक विविधता है—शिमला-कुल्लू में समशीतोष्ण देवदार वन हैं तो लाहुल-स्पीति में तिब्बती पठार जैसा शुष्क शीत मरुस्थल। सतलुज, ब्यास, रावी और चिनाब नदियां गहरी घाटियों का निर्माण करती हैं। चंद्रताल, पराशर, खज्जियार और रेणुका जी जैसी हिमनद झीलें प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान हैं।
हिमाचली जनजीवन में ग्राम देवताओं (कुलदेवता) का अटूट महत्व है। कुल्लू का दशहरा, मंडी की महाशिवरात्रि, मिंजर मेला (चंबा) और लवी मेला (रामपुर) राज्य की अद्वितीय देव परंपरा के परिचायक हैं। कांगड़ा की लघु चित्रकला (मिनिएचर पेंटिंग), कुल्लवी शॉल, चंबा रुमाल और किन्नौरी टोपियां विश्व भर में सराही जाती हैं। भोजन में कांगड़ी 'धाम', सिड्डू, मद्रा और भे (कमल ककड़ी) का स्वाद अविस्मरणीय है।
हिमाचल में यात्रा का स्वरूप मौसम पर निर्भर करता है। वसंत व ग्रीष्म (अप्रैल-जून) घाटियों के भ्रमण और ट्रेकिंग के लिए सर्वोत्तम हैं, जबकि हिमपात प्रेमियों के लिए दिसंबर से फरवरी अनुकूल है। मानसून (जुलाई-अगस्त) में भूस्खलन की आशंका रहती है, अतः सावधानी बरतें। कालका-शिमला टॉय ट्रेन एक ऐतिहासिक यूनेस्को अनुभव है। चंडीगढ़ और दिल्ली से नियमित वोल्वो बसें उपलब्ध हैं।
कालका से शिमला के बीच लगभग 96 किलोमीटर की दूरी तय करने में टॉय ट्रेन को 5 से 6 घंटे लगते हैं। इस दौरान ट्रेन 102 सुरंगों, 800 से अधिक पुलों और सुरम्य चीड़ के वनों से होकर गुजरती है।
सबसे लोकप्रिय परिपथ शिमला → किन्नौर (कल्पा/सांगला) → नाको → ताबो → कज़ा → चंद्रताल → मनाली है। यह मार्ग धीरे-धीरे ऊंचाई पर अनुकूलन (Acclimatization) के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है।
चंबा जिले में डलहौजी के निकट स्थित 'खज्जियार' को अपनी हरी-भरी अल्पाइन चरागाह, केंद्रीय झील और घने देवदार वनों के कारण भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है।
धाम हिमाचल का पारंपरिक उत्सव भोज है जिसे 'बोटी' (पारंपरिक ब्राह्मण रसोइये) पीतल के बर्तनों में तैयार करते हैं। इसमें बिना प्याज-लहसुन के दाल, मद्रा, कढ़ी, खट्टा और मीठे चावल का पारस दिया जाता है।