बृहदीश्वर मंदिर (पेरुवुदैयार कोविल), तंजावुर
1010 ई. में सम्राट राजराज चोल प्रथम द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर मंदिर, 216 फीट ऊंचा विमानम् और 80 टन का एकाश्म कुंभम शिखर।
चोल, पल्लव और पांड्य राजवंशों द्वारा पाषाणों में उकेरी गई अमर द्रविड़ स्थापत्य कला, कावेरी की पुण्य धारा, नीलगिरि की नीली पहाड़ियां और रामेश्वरम में धनुषकोडि का पावन संगम तमिलनाडु को अध्यात्म का महासागर बनाते हैं।
1010 ई. में सम्राट राजराज चोल प्रथम द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर मंदिर, 216 फीट ऊंचा विमानम् और 80 टन का एकाश्म कुंभम शिखर।
वैगई नदी तट पर 2,500 वर्ष प्राचीन मंदिर, 14 रंग-बिरंगे गगनचुंबी गोपुरम, सहस्र स्तंभ मंडप और स्वर्ण कमल सरोवर (पोत्रमारै कुलम)।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पावन सेतुतीर्थ, 1,212 स्तंभों वाला विश्व का सबसे लंबा मंदिर गलियारा, 22 पवित्र कुंड और रामसेतु का आरंभ स्थल।
पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम द्वारा 7वीं सदी में निर्मित 5 पंचरथ, अर्जुन की तपस्या (विशाल पाषाण उत्कीर्णन) और बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित शोर टेंपल।
भारत की मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु जहाँ बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर मिलते हैं, एवं समुद्र में स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल।
पहाड़ियों की रानी ऊटी, यूनेस्को नीलगिरि माउंटेन रेलवे, बॉटनिकल गार्डन, डोड्डाबेट्टा पीक और नीलगिरि चाय के बगान।
तमिलनाडु विश्व की प्राचीनतम जीवित शास्त्रीय भाषा 'तमिल' और संगम साहित्य की उद्गम स्थली है। चोल साम्राज्य (राजराज चोल एवं राजेंद्र चोल) ने अपनी शक्तिशाली नौसेना के बल पर श्रीविजय (इंडोनेशिया-मलेशिया) तक सांस्कृतिक और व्यापारिक प्रभाव स्थापित किया। पल्लवों ने मामल्लपुरम में शैलकृत रथ और गुफा मंदिर बनाए, जबकि पांड्यों ने मदुरै को शिक्षा और कला की राजधानी बनाया। त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री की कर्नाटक संगीत त्रिमूर्ति ने यहाँ भक्ति संगीत को अमर किया।
तमिलनाडु कोरोमंडल तट के समानांतर फैला है, जिसके पश्चिम में नीलगिरि, अन्नामलाई और पलानी की पर्वत शृंखलाएं हैं। कावेरी नदी को तमिलनाडु की जीवनधारा (पोन्नी) माना जाता है, जो तंजावुर में उपजाऊ 'चावल का कटोरा' डेल्टा बनाती है। मन्नार की खाड़ी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान में प्रवाल भित्तियां और दुर्लभ डुगोंग (समुद्री गाय) पाए जाते हैं। मुदुमलाई और अनामलाई टाइगर रिज़र्व एशियाई हाथियों के विशालतम गलियारे हैं।
भरतनाट्यम (शास्त्रीय नृत्य) की जन्मभूमि तमिलनाडु की पहचान उसके भव्य मंदिर उत्सवों में है। पोंगल (सूर्य कृतज्ञता पर्व) पर जल्लीकट्टू की प्राचीन परंपरा आयोजित होती है। कांजीवरम शुद्ध रेशम की जरीदार साड़ियां, तंजावुर ग्लास पेंटिंग और स्वामिमलाई की कांस्य मूर्तियां वैश्विक धरोहर हैं। इडली-सांभर, मसाला डोसा, चेट्टीनाड तीखा भोजन, फिल्टर कॉफी और पोंगल यहाँ के दैनिक जीवन की मिठास हैं।
तमिलनाडु भ्रमण का सबसे सुखद समय नवंबर से मार्च है। मदुरै, तंजावुर, कुंभकोणम और तिरुचिरापल्ली के प्राचीन मंदिरों में दर्शन के लिए पारंपरिक परिधान (धोती/कुर्ता या साड़ी) अनिवार्य है। नीलगिरि माउंटेन रेलवे (मेट्टुपालयम से ऊटी) की यात्रा के लिए आईआरसीटीसी पर महीनों पूर्व बुकिंग आवश्यक होती है।
1,000 वर्ष पूर्व बिना क्रेन के, चोल इंजीनियरों ने मंदिर से 6 किलोमीटर दूर सारपल्लम नामक स्थान से एक विशाल मिट्टी का ढलान (Incline Ramp) बनाया था, जिस पर हाथियों और लकड़ी के रोलर्स की सहायता से 80 टन के एकाश्म कुंभम को 216 फीट की ऊंचाई पर स्थापित किया गया।
तिरुचिरापल्ली स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (श्रीरंगम) 156 एकड़ में फैला विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय हिंदू मंदिर परिसर है। इसमें 7 संकेंद्रित परकोटे और 21 भव्य गोपुरम हैं।
1964 के प्रलयंकारी चक्रवात में पूरा धनुषकोडि नगर, रेलवे स्टेशन और यात्री ट्रेन समुद्र में विलीन हो गए थे। तब से यह निर्जन है जहाँ चक्रवात के अवशेष, शांत समुद्र तट और रामसेतु के दर्शन होते हैं।
चेट्टियार व्यापारियों द्वारा 19वीं सदी में निर्मित ये विशाल हवेलियां बर्मा टीक, इटालियन मार्बल और अंडे की सफेदी से बने चिकने चूने के प्लास्टर से बनाई गई थीं, जिनमें 50 से 100 तक कमरे होते हैं।